श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 24: नीचे के स्वर्गीय लोकों का वर्णन  »  श्लोक 2

 
श्लोक
यददस्तरणेर्मण्डलं प्रतपतस्तद्विस्तरतो योजनायुतमाचक्षते द्वादशसहस्रं सोमस्य त्रयोदशसहस्रं राहोर्य: पर्वणि तद्‌व्य‍वधानकृद्वैरानुबन्ध: सूर्याचन्द्रमसावभिधावति ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
यत्—जो; अद:—वह; तरणे:—सूर्य का; मण्डलम्—गोलक; प्रतपत:—जो सदैव उष्मा प्रदान करता है; तत्—वह; विस्तरत:—विस्तार में; योजन—आठ मील की दूरी; अयुतम्—दस हजार; आचक्षते—उनका अनुमान है; द्वादश-सहस्रम्— बीस हजार योजन; सोमस्य—चन्द्रमा का; त्रयोदश—तीस; सहस्रम्—हजार; राहो:—राहु नामक ग्रह का; य:—जो; पर्वणि— अवसर पर; तत्-व्यवधान-कृत्—जिसने अमृत वितरण के समय सूर्य तथा चन्द्रमा के लिए अवरोध उत्पन्न किया; वैर- अनुबन्ध:—वैर भाव; सूर्या—सूर्य; चन्द्रमसौ—तथा चन्द्रमा; अभिधावति—पूर्णिमा तथा अमावस्या के समय उनका पीछा करता है ।.
 
अनुवाद
 
 उष्मा के स्रोत सूर्य गोलक का विस्तार १०,००० योजन (८०,००० मील) है। चन्द्रमा का २०,००० योजन (१६०,००० मील) और राहु का ३०,००० योजन (२४०,००० मील) तक फैला हुआ है। अमृत वितरण के समय राहु ने सूर्य तथा चन्द्रमा के मध्य आसीन होकर उनके बीच विद्वेष उत्पन्न करना चाहा। राहु, सूर्य तथा चन्द्रमा दोनों के प्रति शत्रुभाव रखता है। इसलिए वह सदा अमावस्या तथा पूर्णिमा के दिन उनको ढकने का प्रयत्न करता रहता है।
 
तात्पर्य
 जैसाकि यहाँ बताया गया है सूर्य १०,००० योजन तक और चन्द्रमा इससे दूना २०,००० योजन तक विस्तीर्ण है। यहाँ द्वादश शब्द का अर्थ दस का दो गुना अर्थात् बीस मानना चाहिए। विजयध्वज के मत से राहु को चन्द्रमा का दो गुना अर्थात् ४०,००० योजन तक विस्तीर्ण होना चाहिए। किन्तु भागवत
के इस विरोधाभास से सहमत होने के लिए वे राहु के सम्बन्ध में निम्नलिखित उद्धरण प्रस्तुत करते हैं—राहुसोमरवीणां तु मण्डला द्विगुणोक्तिताम्—जिसका अर्थ है कि राहु चन्द्रमा से दुगुना बड़ा है और चन्द्रमा सूर्य से दुगुना है। यह निष्कर्ष टीकाकार विजयध्वज का है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥