श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 24: नीचे के स्वर्गीय लोकों का वर्णन  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक
ततोऽधस्ताद्यक्षरक्ष: पिशाचप्रेतभूतगणानां विहाराजिरमन्तरिक्षं यावद्वायु: प्रवाति यावन्मेघा उपलभ्यन्ते ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
तत: अधस्तात्—सिद्ध, चारण तथा विद्याधर लोकों से नीचे; यक्ष-रक्ष:-पिशाच-प्रेत-भूत-गणानाम्—यक्ष, राक्षस, पिशाच भूत इत्यादि के; विहार-अजिरम्—भोग-विलास का स्थान; अन्तरिक्षम्—अन्तरिक्ष या आकाश में; यावत्—जहाँ तक; वायु:— वायु; प्रवाति—बहती है; यावत्—जहाँ तक; मेघा:—मेघ; उपलभ्यन्ते—देखे जाते हैं ।.
 
अनुवाद
 
 अन्तरिक्ष में विद्याधरलोक, चारणलोक तथा सिद्धलोक के नीचे यक्षों, राक्षसों, पिशाचों, भूतों इत्यादि के भोगविलास के स्थान हैं। जहाँ तक वायु प्रवाहित होती है और आकाश में बादल तैरते हैं, वहाँ तक अन्तरिक्ष का विस्तार है। इसके ऊपर वायु नहीं है।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥