श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 25: भगवान् अनन्त की महिमा  »  श्लोक 14

 
श्लोक
एता ह्येवेह नृभिरुपगन्तव्या गतयो यथाकर्मविनिर्मिता यथोपदेशमनुवर्णिता: कामान् कामयमानै: ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
एता:—ये सब; हि—निस्सन्देह; एव—ही; इह—इस ब्रह्माण्ड में; नृभि:—समस्त जीवों द्वारा; उपगन्तव्या:—उपलब्ध करने योग्य; गतय:—गन्तव्य; यथा-कर्म—अपने-अपने पूर्व कर्मों के अनुसार; विनिर्मिता:—उत्पन्न किये गये; यथा-उपदेशम्—जैसा उपदेश दिया गया; अनुवर्णिता:—तदनुसार वर्णित; कामान्—भौतिक सुख; कामयमानै:—कामना करने वालों के द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजन्, मैंने अपने गुरु से जैसा सुना था, उसी रूप में मैंने बद्धजीवों के सकाम कर्मों एवं कामनाओं के अनुसार इस जगत की सृष्टि का पूर्ण वर्णन आपसे किया है। भौतिक कामनाओं से पूर्ण बद्धजीवों को विभिन्न लोकों में अनेक स्थान प्राप्त होते रहते हैं और इस प्रकार वे इसी भौतिक सृष्टि के भीतर रहते चले आते हैं।
 
तात्पर्य
 इस प्रसंग में श्रील भक्तिविनोद ठाकुर का गीत है—
अनादिकरम-फले, पडि’ भवार्णव-जले, तरिबारे ना देखि उपाय।

“हे प्रभो, मैं यह नहीं जानता कि मेरा भौतिक जीवन कब प्रारम्भ हुआ, किन्तु मुझे इसका पूरा अनुभव होता है कि मैं अज्ञान के इस भवसागर में गिर गया हूँ। अब मैं यह भी देख सकता हूँ कि आपके चरणकमलों की शरण के अतिरिक्त उसमें से निकलने का कोई दूसरा उपाय नहीं हैं।” इसी प्रकार श्री चैतन्य महाप्रभु प्रार्थना करते हैं—

अयि नन्दतनुज किंकरं पतितं मां विषमे भवाम्बुधौ।

कृपया तव पादपंकजस्थितधूलीसदृशं विचिन्तय ॥

“हे भगवन्, नन्द महाराज के पुत्र! मैं आपका चिरन्तन दास हूँ। न जाने मैं कैसे अज्ञान के इस भवसागर में गिर गया हूँ। अत: कृपा करके भौतिक जीवन की विषम स्थिति से मेरा उद्धार कीजिए।”

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥