श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 26: नारकीय लोकों का वर्णन  »  श्लोक 1

 
श्लोक
राजोवाच
महर्ष एतद्वैचित्र्यं लोकस्य कथमिति ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
राजा उवाच—राजा बोला; महर्षे—हे महर्षि (शुकदेव गोस्वामी); एतत्—यह; वैचित्र्यम्—विचित्रता; लोकस्य—जीवात्माओं की; कथम्—किस प्रकार; इति—इस प्रकार ।.
 
अनुवाद
 
 राजा परीक्षित ने शुकदेव गोस्वामी से पूछा—हे महाशय, जीवात्माओं को विभिन्न भौतिक गतियाँ क्यों प्राप्त होती हैं? कृपा करके मुझसे कहें।
 
तात्पर्य
 श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने विवेचना की है कि इस ब्रह्माण्ड में विभिन्न नरक लोक गर्भोदक सागर से थोड़ा ऊपर स्थित हैं और वहीं स्थित रहते हैं। इस अध्याय में यह बताया गया है कि
समस्त पापी लोग किस प्रकार इन नरक लोकों में जाते हैं और वहाँ पर यमराज के दूतों द्वारा प्रताडि़त किये जाते हैं। विभिन्न प्राणी अपने विगत कर्मों के अनुसार सुख या दुख भोगते हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥