श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 26: नारकीय लोकों का वर्णन  »  श्लोक 10

 
श्लोक
यस्त्विह वा एतदहमिति ममेदमिति भूतद्रोहेण केवलं स्वकुटुम्बमेवानुदिनं प्रपुष्णाति स तदिह विहाय स्वयमेव तदशुभेन रौरवे निपतति ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
य:—जो; तु—लेकिन; इह—इस जीवन में; वा—अथवा; एतत्—यह देह; अहम्—मैं; इति—इस प्रकार; मम—मेरा; इदम्— यह; इति—इस प्रकार; भूत-द्रोहेण—अन्य जीवात्माओं की ईर्ष्या से; केवलम्—अकेले; स्व-कुटुम्बम्—अपने कुटुम्बी जनों को; एव—केवल; अनुदिनम्—नित्य-प्रति; प्रपुष्णाति—निर्वाह करता है; स:—ऐसा व्यक्ति; तत्—वह; इह—यहाँ; विहाय— छोडक़र; स्वयम्—स्वयं; एव—ही; तत्—उसका; अशुभेन—पाप द्वारा; रौरवे—रौरव में; निपतति—गिर जाता है ।.
 
अनुवाद
 
 ऐसा व्यक्ति जो अपने शरीर को “स्व” मान लेता है अपने शरीर तथा अपनी पत्नी और पुत्रों के पालन के लिए धन कमाने के लिए अहर्निश कठोर श्रम करता है। ऐसा करने में वह अन्य जीवात्माओं के प्रति हिंसा कर सकता है। ऐसे पुरुष को मृत्यु के समय अपनी तथा अपने परिवार की देहों को त्यागना पड़ता है और अन्य प्राणियों के प्रति की गई ईर्ष्या का कर्मफल यह मिलता है कि उसे रौरव नामक नरक में फेंक दिया जाता है।
 
तात्पर्य
 श्रीमद्भागवत (१०.८४.१३) में कहा गया है कि यस्यात्मबुद्धि: कुणपे त्रिधातुके स्वधी: कलत्रादिषु भौमइज्यधी:।
यत्तीर्थबुद्धि: सलिले न कर्हिचित् जनेष्वभिज्ञेषु स एव गोखर: ॥

“जो तीन तत्त्वों (पित्त, कफ तथा वायु) से भरे शरीर रूप थैले को “स्व” मान लेता है, जो अपनी पत्नी तथा पुत्रों से घनिष्ठतापूर्वक बँधा रहता है, जो अपनी भूमि को पूज्य मानता है, जो पवित्र तीर्थस्थानों के जल में स्नान करता है, किन्तु जो वास्तविक ज्ञानी पुरुषों से लाभ नहीं उठाता, वह गधे या गाय के तुल्य है।” दो प्रकार के पुरुष जीवन की भौतिकता में मग्न रहते हैं। प्रथम प्रकार के पुरुष अज्ञानतावश अपने शरीर को “स्व” मान लेते हैं अत: वे निश्चय ही पशुतुल्य हैं (स एव गोखर: )। किन्तु दूसरे प्रकार का पुरुष न केवल अपने भौतिक शरीर को “स्व” मान लेता है, वरन् अपने शरीर पालन के लिए नाना प्रकार के पाप करता है। वह अपने परिवार के लिए और अपने लिए सबों को ठगता है और अन्यों से अकारण ईर्ष्या करता है। ऐसा व्यक्ति रौरव नरक में फेंक दिया जाता है। यदि कोई अपने शरीर को ही पशुओं की तरह स्वयं मानता है, तो वह अधिक पापी नहीं होता। किन्तु यदि अपने शरीर-पालन के लिए वृथा ही पापकर्म करता है, तो उसे रौरव नरक में रखा जाता है। ऐसा श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर का मत है। यद्यपि पशुओं में जीवन के प्रति देहात्मबुद्धि है, किन्तु वे अपने शरीर अपने जोड़ों या बच्चों के पालन के लिए कोई पाप नहीं करते। इसलिए पशुओं को नरक नहीं मिलता, किन्तु जब मनुष्य ईर्ष्या करता है और अपने शरीर-पालन के लिए अन्यों को ठगता है, तो उसे नारकीय अवस्था में रखा जाता है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥