श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 26: नारकीय लोकों का वर्णन  »  श्लोक 15

 
श्लोक
यस्त्विह वै निजवेदपथादनापद्यपगत: पाखण्डं चोपगतस्तमसिपत्रवनं प्रवेश्य कशया प्रहरन्ति तत्र हासावितस्ततो धावमान उभयतोधारैस्तालवनासिपत्रैश्छिद्यमानसर्वाङ्गो हा हतोऽस्मीति परमया वेदनया मूर्च्छित: पदे पदे निपतति स्वधर्महा पाखण्डानुगतं फलं भुङ्क्ते ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
य:—जो कोई; तु—लेकिन; इह—इस जीवन में; वै—निस्संदेह; निज-वेद-पथात्—वेदों द्वारा बताये गये अपने पथ से; अनापदि—बिना आपात काल के; अपगत:—दूर हटा हुआ; पाखण्डम्—पाखण्डवाद; च—तथा; उपगत:—पास पहुँचा हुआ; तम्—उसको; असि-पत्रवनम्—असिपत्रवन नामक नरक में; प्रवेश्य—प्रविष्ट कराकर; कशया—चाबुक से; प्रहरन्ति—पीटते हैं; तत्र—वहाँ; ह—ही; असौ—वह; इत: तत:—इधर-उधर; धावमान:—दौड़ते हुए; उभयत:—दोनों ओर; धारै:—तीक्ष्ण नौकों से; ताल-वन-असि-पत्रै:—ताड़ वृक्षों की तलवार जैसी पत्तियों से; छिद्यमान—छिदकर; सर्व-अङ्ग:—जिसका सम्पूर्ण शरीर; हा—हाय; हत:—मर गया; अस्मि—हूँ; इति—इस प्रकार; परमया—असह्य; वेदनया—पीड़ा से; मूर्च्छित:—मूर्च्छित, संज्ञाशून्य; पदे पदे—प्रति पग पर; निपतति—गिर पड़ता है; स्व-धर्म-हा—अपने धर्म के नियमों का हन्ता; पाखण्ड-अनुगतम् फलम्—नास्तिक पथग्रहण करने का फल; भुङ्क्ते—भोगता है, सहता है ।.
 
अनुवाद
 
 यदि कोई व्यक्ति किसी प्रकार की विपत्ति न होने पर भी वैदिक पथ से हटता है, तो यमराज के दूत उसे असिपत्रवन नामक नरक में ले जाकर कोड़ों से पीटते हैं। जब वह अत्यधिक पीड़ा के कारण इधर-उधर दौड़ता है, तो उसे अपने चारों ओर तलवार के समान तीक्ष्ण ताड़ वृक्षों की पत्तियों के बीच छटपटाता है। इस प्रकार पूरा शरीर क्षत-विक्षत होने से वह प्रति पग-पग पर मूर्च्छित होता रहता है और चीत्कार करता है, “हाय! अब मैं क्या करूँ? मैं किस प्रकार से बचूँ!” मान्य धार्मिक नियमों से विपथ होने का ऐसा ही दण्ड मिलता है।
 
तात्पर्य
 वास्तव में धार्मिक नियम केवल एक है—धर्मं तु साक्षाद् भवगत्प्रणीतम्। श्रीभगवान् के आदेशों का पालन करना ही एकमात्र धार्मिक नियम है। दुर्भाग्यवश, इस कलियुग में विशेषत: प्रत्येक व्यक्ति नास्तिक है। मनुष्य ईश्वर में विश्वास तक नहीं करते, उनके वचनों का पालन तो दूर रहा। निज वेद-पथ का यह अर्थ भी हो सकता है-“किसी के अपने धार्मिक नियमों का समुच्चय।” प्रारम्भ में केवल एक वेद-पथ अर्थात् धार्मिक नियमों का समुच्चय था, अब अनेक हैं। कोई चाहे जिन धार्मिक नियमों का पालन करे, मात्र बन्धन यह है कि वह उनका कठोरता से पालन करे। नास्तिक वह है जो वेदों को नहीं मानता। किन्तु यदि कोई भिन्न धर्म-पथ का अनुसरण करता है, तो इस श्लोक के अनुसार उसे चाहिए
कि वह उसका अनुसरण करे। कोई चाहे हिन्दू हो या मुसलमान अथवा ईसाई, उसे अपने ही धार्मिक नियमों का पालन करना चाहिए। किन्तु यदि कोई स्वत: अपने मन में अपना धर्म-पथ गढ़ लेता है या वह किसी भी धार्मिक नियम का पालन नहीं करता, तो उसे असिपत्रवन नामक नरक की यातना भोगनी पड़ती है। कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य को किन्हीं धार्मिक नियमों का पालन करना चाहिए। यदि वह ऐसा नहीं करता तो वह पशु से किसी भी प्रकार श्रेष्ठतर नहीं। ज्यों-ज्यों कलियुग आगे बढ़ रहा है, मनुष्य नास्तिक होते जा रहे हैं और तथाकथित धर्म-निरपेक्षता को ग्रहण कर रहे हैं। उन्हें इसका तनिक भी ज्ञान नहीं है कि असिपत्रवन में उन्हें दण्डित किया जाएगा जैसा कि इस श्लोक में वर्णित है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥