श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 26: नारकीय लोकों का वर्णन  »  श्लोक 16

 
श्लोक
यस्त्विह वै राजा राजपुरुषो वा अदण्ड्ये दण्डं प्रणयति ब्राह्मणे वा शरीरदण्डं स पापीयान्नरकेऽमुत्र सूकरमुखे निपतति तत्रातिबलैर्विनिष्पिष्यमाणावयवो यथैवेहेक्षुखण्ड आर्तस्वरेण स्वनयन् क्‍वचिन्मूर्च्छित: कश्मलमुपगतो यथैवेहाद‍ृष्टदोषा उपरुद्धा: ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
य:—जो कोई; तु—लेकिन; इह—इस जीवन में; वै—निस्सन्देह; राजा—राजा; राज-पुरुष:—राजा का आदमी; वा—अथवा; अदण्ड्ये—अदण्डनीय को; दण्डम्—दण्ड; प्रणयति—देता है; ब्राह्मणे—ब्राह्मण को; वा—अथवा; शरीर-दण्डम्—शारीरिक दण्ड; स:—वह व्यक्ति, राजा अथवा राज्याधिकारी; पापीयान्—पापी मनुष्यों को; नरके—नरक में; अमुत्र—अगले जन्म में; सूकरमुखे—सूकरमुख नरक में; निपतति—गिरता है; तत्र—वहाँ; अति-बलै:—अत्यन्त बलशाली यमदूतों द्वारा; विनिष्पिष्यमाण—कुचला जाकर; अवयव:—शरीर के विभिन्न अंग; यथा—सदृश; एव—ही; इह—यहाँ; इक्षु-खण्ड:—गन्नों के टुकड़े; आर्त-स्वरेण—करुण स्वर से; स्वनयन्—चिल्लाते हुए; क्वचित्—कभी-कभी; मूर्च्छित:—मूर्च्छित होकर; कश्मलम् उपगत:—मोहग्रस्त होकर; यथा—सदृश; एव—निस्सन्देह; इह—यहाँ; अदृष्ट-दोषा:—जो दोषी नहीं है; उपरुद्धा:— दण्ड हेतु बन्दी बनाया गया ।.
 
अनुवाद
 
 अगले जन्म में यमदूत निर्दोष पुरुष या ब्राह्मण को शारीरिक दण्ड देने वाले पापी राजा अथवा राज्याधिकारी को सूकरमुख नामक नरक में ले जाते हैं जहाँ उसे यमराज के दूत उसी प्रकार कुचलते हैं जिस प्रकार गन्ने को पेर कर रस निकाला जाता है। जिस प्रकार से निर्दोष व्यक्ति दण्डित होते समय अत्यन्त दण्डनीय ढंग से चिल्लाता है और मूर्च्छित होता है ठीक उसी तरह पापी जीवात्मा भी आर्तनाद करता एवं मूर्च्छित होता है। निर्दोष व्यक्ति को दण्ड देकर पीडि़त करने का यही फल है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥