श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 26: नारकीय लोकों का वर्णन  »  श्लोक 17

 
श्लोक
यस्त्विह वै भूतानामीश्वरोपकल्पितवृत्तीनामविविक्तपरव्यथानां स्वयं पुरुषोपकल्पितवृत्तिर्विविक्तपरव्यथो व्यथामाचरति स परत्रान्धकूपे तदभिद्रोहेण निपतति तत्र हासौ तैर्जन्तुभि: पशुमृगपक्षिसरीसृपैर्मशकयूकामत्कुणमक्षिकादिभिर्ये के चाभिद्रुग्धास्तै: सर्वतोऽभिद्रुह्यमाणस्तमसि विहतनिद्रानिर्वृतिरलब्धावस्थान: परिक्रामति यथा कुशरीरे जीव: ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
य:—जो कोई; तु—लेकिन; इह—इस जीवन में; वै—निस्सन्देह; भूतानाम्—कुछ जीवात्माओं को; ईश्वर—परम नियन्ता द्वारा; उपकल्पित—बनाया गया; वृत्तीनाम्—जिनकी जीविका; अविविक्त—न जानते हुए; पर-व्यथानाम्—पर-पीड़ा; स्वयम्—अपने आप; पुरुष-उपकल्पित—श्रीभगवान् द्वारा निर्मित; वृत्ति:—जिनकी जीविका; विविक्त—जानते हुए; पर-व्यथ:—पर पीड़ा; व्यथाम् आचरति—तो भी पीड़ा पहुँचाता है; स:—ऐसा व्यक्ति; परत्र—अगले जन्म में; अन्धकूपे—अन्धकूप नरक में; तत्— उनको; अभिद्रोहेण—द्रोह करने से; निपतति—गिरता है; तत्र—वहाँ; ह—निस्सन्देह; असौ—वह व्यक्ति; तै: जन्तुभि:—उन-उन जीवों द्वारा; पशु—पशु; मृग—जंगली जानवर; पक्षि—पक्षी; सरीसृपै:—सर्प; मशक—मच्छर; यूका—जूँ; मत्कुण—कीड़े; मक्षिक-आदिभि:—मक्खी आदि; ये के—अन्य जितने; च—और; अभिद्रुग्धा:—दण्डित; तै:—उनके द्वारा; सर्वत:—सर्वत्र; अभिद्रुह्यमाण:—पीड़ा पहुँचाये हुए; तमसि—अंधकार में; विहत—विक्षुब्ध; निद्रा-निर्वृति:—जिनके वासस्थान; अलब्ध— प्राप्त न होने वाले; अवस्थान:—आवास; परिक्रामति—घूमता है; यथा—जिस प्रकार; कु-शरीरे—निम्न योनि के देह में; जीव:—जीव ।.
 
अनुवाद
 
 परमेश्वर की व्यवस्था से खटमल तथा मच्छर जैसे निम्न श्रेणी के जीव मनुष्यों तथा अन्य पशुओं का रक्त चूसते हैं। इन तुच्छ प्राणियों को इसका ज्ञान नहीं होता है कि उनके काटने से मनुष्यों को पीड़ा होती होगी। किन्तु उच्च श्रेणी के मुनष्यों—यथा ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य— में चेतना विकसित रूप में होती है, अत: वे जानते हैं कि किसी का प्राणघात करना कितना कष्टदायक है। यदि ज्ञानवान होते हुए भी मनुष्य विवेकहीन तुच्छ प्राणियों को मारता है या सताता है, तो वह निश्चय ही पाप करता है। श्रीभगवान् ऐसे मनुष्य को अन्धकूप में रखकर दण्डित करते हैं जहाँ उसे वे समस्त पक्षी तथा पशु, सर्प, मच्छर, जूँ, कीड़े, मक्खियाँ तथा अन्य प्राणी, जिनको उसने अपने जीवनकाल में सताया था, उस पर चारों ओर से आक्रमण करते हैं और उसकी नींद हराम कर देते हैं। आराम न कर सकने के कारण वह अंधकार में घूमता रहता है। इस प्रकार अन्धकूप में उसे वैसी ही यातना मिलती है जैसी कि निम्न योनि के प्राणी को।
 
तात्पर्य
 इस शिक्षाप्रद श्लोक से हमें पता चलता है कि निम्न प्राणी प्रकृति के नियमानुसार मनुष्यों को तंग करने के लिए उत्पन्न किये गये हैं, अत: वे दण्डनीय नहीं हैं। चूँकि मनुष्यों में चेतना विकसित है, अत: वे वर्णाश्रम धर्म के नियमों के विरुद्ध कुछ भी नहीं कर सकते, अन्यथा भर्त्सना के पात्र होंगे। श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता (४.१३) में कहा है—चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश:—“प्रकृति के त्रिगुणों और नियत कर्म के अनुसार चारों वर्ण मेरे द्वारा रचे गये हैं।” अत: समस्त मनुष्यों को चार वर्णों—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र—में विभाजित करना
चाहिए और उन्हें निर्दिष्ट नियमों के अनुसार कार्य करना चाहिए। वे उन नियमों से तनिक भी विपथ नहीं हो सकते। इन नियमों में से एक में बताया गया है उन्हें किसी पशु को, यहाँ तक कि जो मनुष्यों को सताते हैं उन्हें भी कष्ट नहीं पहुँचाना चाहिए। यद्यपि शेर किसी पशु पर आक्रमण करके उसे मार कर उसका मांस खाता है तथापि वह पापमय नहीं है, किन्तु यदि विकसित चेतना से पूर्ण मनुष्य भी ऐसा करे तो उसे दण्डित किया जाना चाहिए। दूसरे शब्दों में, वह मनुष्य जो अपनी विकसित चेतना का उपयोग नहीं करता, वरन् उल्टे पशुवत् व्यवहार करता है, वह अनेक नरकों में दण्ड पाता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥