श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 26: नारकीय लोकों का वर्णन  »  श्लोक 18

 
श्लोक
यस्त्विह वा असंविभज्याश्नाति यत्किञ्चनोपनतमनिर्मितपञ्चयज्ञो वायससंस्तुत: स परत्र कृमिभोजने नरकाधमे निपतति तत्र शतसहस्रयोजने कृमिकुण्डे कृमिभूत: स्वयं कृमिभिरेव भक्ष्यमाण: कृमिभोजनो यावत्तदप्रत्ताप्रहूतादोऽनिर्वेशमात्मानं यातयते ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
य:—कोई व्यक्ति जो; तु—लेकिन; इह—इस जीवन में; वा—अथवा; असं-विभज्य—बिना बाँटे; अश्नाति—खाता है; यत् किञ्चन—जो भी; उपनतम्—श्रीकृष्ण की कृपा से प्राप्त; अनिर्मित—बिना किये हुए; पञ्च-यज्ञ:—पाँच प्रकार के यज्ञ; वायस—कौवे; संस्तुत:—सम रूप में वर्णित; स:—ऐसा पुरुष; परत्र—अगले जन्म में; कृमिभोजने—कृमिभोजन लोक में; नरक-अधमे—अत्यन्त निकृष्ट नरक में; निपतति—गिरता है; तत्र—वहाँ; शत-सहस्र-योजने—१,००,००० योजन वाले (८,००,००० मील वाले); कृमि-कुण्डे—कीड़ों के कुंड में; कृमि-भूत:—कीड़ों में से एक बनना; स्वयम्—स्वयं; कृमिभि:—अन्य कीड़ों के द्वारा; एव—निश्चय ही; भक्ष्यमाण:—भक्षित होकर; कृमि-भोजन:—खाद्य कीड़े; यावत्—जहाँ तक; तत्—वह कुंड चौड़ा है; अप्रत्त-अप्रहूत—बिना बाँटा और बिना दिया हुआ भोजन; अद:—जो खाता है; अनिर्वेशम्— जिसने परिशोध नहीं किया; आत्मानम्—अपने आपको; यातयते—पीड़ा पहुँचाता है ।.
 
अनुवाद
 
 जो मनुष्य कुछ भोजन प्राप्त होने पर उसे अतिथियों, वृद्ध पुरुषों तथा बच्चों को न बाँट कर स्वयं खा जाता है अथवा बिना पंचयज्ञ किये खाता है, उसे कौवे के समान मानना चाहिए। मृत्यु के बाद वह सबसे निकृष्ट नरक कृमिभोजन में रखा जाता है। इस नरक में एक लाख योजन (८,००,००० मील वाले) विस्तृत वाला कीड़ों से परिपूर्ण एक कुंड है। वह इस कुंड में कीड़ा बनकर रहता है और दूसरों कीड़ों को खाता है और ये कीड़े उसे खाते हैं। जब तक वह पापी अपने पापों का प्रायश्चित नहीं कर लेता, तब तक वह कृमिभोजन के नारकीय कुंड में उतने वर्षों तक पड़ा रहता है, जितने योजन इस कुंड की चौड़ाई है।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता (३.१३) में कहा गया है—
यज्ञशिष्टाशिन: सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषै:।

भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥

“यज्ञ से बचे भोजन को करने वाले भगवद्भक्त सब पापों से मुक्त हो जाते हैं, किन्तु जो इन्द्रियतृप्ति के लिए भोजन बनाते हैं, वे तो पाप ही खाते हैं।” हमें सारा भोजन श्रीभगवान् से प्राप्त है। एको बहूंना यो विदधाति कामान्—भगवान् हर एक को जीवन की आवश्यकताएँ प्रदान करते हैं, अत: हमें चाहिए कि उनके अनुग्रह को यज्ञ द्वारा स्वीकार करें। यह प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है। दरअसल, जीवन का एकमात्र उद्देश्य यज्ञ करना है। श्रीकृष्ण के अनुसार (भगवद्गीता ३.९)—

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धन:।

तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्ग: समाचर ॥

“भगवान विष्णु के लिए यज्ञरूप में कर्म करना चाहिए, अन्यथा कर्म से इस भौतिक जगत में मनुष्य बँध जाता है। इसलिए हे कुन्तीपुत्र! विष्णु की प्रसन्नता के लिए निर्दिष्ट कर्म का आचरण कर। इस प्रकार करने से तू नित्य अनासक्त तथा बन्धनमुक्त रहेगा।” यदि हम यज्ञ नहीं करते है और दूसरों को प्रसाद वितरित नहीं करते तो हमारे जीवन को धिक्कार है। यज्ञ कर लेने तथा आश्रितों को अर्थात् बच्चों, ब्राह्मणों तथा वृद्धों को प्रसाद वितरित कर लेने के बाद ही मनुष्य को भोजन करना चाहिए। किन्तु यदि कोई केवल अपने लिए या अपने परिवार के लिए रसोई बनाता है, तो वह तथा उसे खाने वाले धिक्कारणीय हैं। मृत्यु के बाद उसे कृमिभोजन नामक नरक में डाल दिया जाता है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥