श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 26: नारकीय लोकों का वर्णन  »  श्लोक 21

 
श्लोक
यस्त्विह वै सर्वाभिगमस्तममुत्र निरये वर्तमानं वज्रकण्टकशाल्मलीमारोप्य निष्कर्षन्ति ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
य:—जो कोई; तु—लेकिन; इह—इस जीवन में; वै—निस्सन्देह; सर्व-अभिगम:—विवेकहीन होकर पशुओं तथा मनुष्यों के साथ मैथुन करता है; तम्—उसको; अमुत्र—अगले जन्म में; निरये—नरक में; वर्तमानम्—विद्यमान; वज्रकण्टक- शाल्मलीम्—वज्र के समान काँटों वाला सेमल वृक्ष पर; आरोप्य—चढ़ाकर; निष्कर्षन्ति—नीचे की ओर खींचते हैं ।.
 
अनुवाद
 
 जो व्यक्ति विवेकहीन होकर—यहाँ तक कि पशुओं के साथ भी—व्यभिचार करता है उसे मृत्यु के बाद वज्रकंटकशाल्मली नामक नरक में ले जाया जाता है। इस नरक में वज्र के समान कठोर काँटों वाला सेमल का वृक्ष है। यमराज के दूत पापी पुरुष को इस वृक्ष से लटका देते हैं और घसीटकर नीचे की ओर खींचते हैं जिससे काँटों के द्वारा उसका शरीर बुरी तरह चिथड़ जाता है।
 
तात्पर्य
 कामेच्छा इतनी प्रबल होती है कि कभी-कभी मनुष्य गाय के साथ मैथुन करता है या स्त्री कुत्ते के साथ संभोग करती है। ऐसे पुरुषों तथा स्त्रियों को वज्रकष्टकशाल्मली नामक नरक में डाला जाता है। कृष्णभावनामृत आन्दोलन अवैध यौन का निषेध करता है। इन श्लोकों
में दिये गये विवरण से हम यह समझ सकते हैं कि अवैध यौन कितना पापमय कृत्य है। कभी-कभी लोगों को नरक के इन विवरणों पर विश्वास नहीं होता, किन्तु कोई माने या न माने, हर कार्य को प्रकृति के नियमों के अनुसार सम्पन्न होना है। उससे कोई बच नहीं सकता।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥