श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 26: नारकीय लोकों का वर्णन  »  श्लोक 23

 
श्लोक
ये त्विह वै वृषलीपतयो नष्टशौचाचारनियमास्त्यक्तलज्जा: पशुचर्यां चरन्ति ते चापि प्रेत्य पूयविण्मूत्रश्लेष्ममलापूर्णार्णवे निपतन्ति तदेवातिबीभत्सितमश्नन्ति ॥ २३ ॥
 
शब्दार्थ
ये—जो पुरुष; तु—लेकिन; इह—इस जीवन में; वै—निस्सन्देह; वृषली-पतय:—शूद्रों के पति; नष्ट—नष्ट; शौच-आचार नियमा:—सफाई, अच्छा आचरण और नियमित जीवन; त्यक्त-लज्जा:—लज्जारहित; पशु-चर्याम्—पशुओं का आचरण; चरन्ति—पालन करते हैं; ते—वे; च—भी; अपि—निस्सन्देह; प्रेत्य—मरकर; पूय—पीब; विट्—मल; मूत्र—मूत्र; श्लेष्म— श्लेष्मा; मला—लार; पूर्ण—भरा हुआ; अर्णवे—समुद्र में; निपतन्ति—गिरते हैं; तत्—वह; एव—एकमात्र; अतिबीभत्सितम्— अत्यन्त बीभत्स (घृणित); अश्नन्ति—भोजन करते हैं ।.
 
अनुवाद
 
 निम्नकुल में जन्मी शूद्र स्त्रियों के निर्लज्ज पति पशुओं की भाँति रहते हैं, अत: उनमें आचरण, शुचिता या नियमित जीवन का अभाव रहता है। ऐसे व्यक्ति मृत्यु के पश्चात् पूयोद नामक नरक में फेंक दिये जाते हैं जहाँ वे मल, पीब, श्लेष्मा, लार तथा ऐसी ही अन्य वस्तुओं से पूर्ण समुद्र में रखे जाते हैं। जो शूद्र अपने को नहीं सुधार पाते वे इस सागर में गिरकर इन घृणित वस्तुओं को खाने के लिए बाध्य किये जाते हैं।
 
तात्पर्य
 श्रील नरोत्तमदास ठाकुर ने गाया है—
कर्मकाण्ड, ज्ञानकाण्ड, केवल विषरे भाण्ड अमृत बलिया येबा खाय नाना योनि सदा फिरे, कदर्य भक्षण करे तार जन्म अद:-पते याय उनका कथन है कि कर्मकाण्ड तथा ज्ञानकाण्ड मार्गों का अनुसरण करने वाले मनुष्य मानव जन्म का अवसर खोते हैं और जन्म-मरण के चक्र में घूमते रहते हैं। अत: सदैव सम्भावना बनी रहती है कि उसे पूयोद नरक में रखा जाय जहाँ उसे मल, मूत्र, पीब, श्लेष्मा, लार तथा अन्य घृणित पदार्थों को खाने के लिए बाध्य किया जाता है। यह उल्लेखनीय है कि यह श्लोक विशेष रूप से शूद्रों के सम्बन्ध में कहा गया है। यदि कोई शूद्र रूप में जन्म लेता है, तो उसे निरन्तर पूयोद सागर में लौट कर अत्यन्त घृणित पदार्थ खाने पड़ते हैं। अत: जन्मजात शूद्र से यह आशा की जाती है कि वह ब्राह्मण बने, यही मानव जीवन का अभिप्राय है। प्रत्येक प्राणी को चाहिए कि वह ऊपर उठे। श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता (४.१३) में कहा है—चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश:—“प्रकृति के त्रिगुणों और नियत कर्म के अनुसार चारों वर्ण मेरे द्वारा रचे गये हैं।” यदि कोई मनुष्य गुणों से शूद्र है, तो उसे चाहिए कि वह अपनी स्थिति सुधार कर ब्राह्मण पद तक पहुँचने के लिए प्रयास करे। किसी को उसे रोकना नहीं चाहिए। चाहे उस की वर्तमान स्थिति कुछ भी हो वास्तव में हर एक को वैष्णव पद तक पहुँचना है। तब वह स्वत: ब्राह्मण हो जाता है। यह तभी सम्भव है जब कृष्णभावनामृत आन्दोलन का प्रसार हो, क्योंकि प्रत्येक प्राणी को हम वैष्णव पद तक लाना चाहते हैं। जैसाकि श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता (१८.६६) में कहा है—सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज—अन्य समस्त कार्यों को त्याग दो और केवल मेरी शरण में आओ। मनुष्य को चाहिए कि शूद्र, क्षत्रिय या वैश्य के वृत्तिपरक कर्मों को त्याग कर वैष्णवों के कर्तव्यों को ग्रहण करे जिसमें ब्राह्मण के कार्यों का समावेश है। इसकी व्याख्या श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता (९.३२) में इस प्रकार की है—

मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्यु: पापयोनय:।

स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥

“हे पार्थ! मेरी शरण लेकर तो जो निम्नयोनि वाले स्त्री, वैश्य और शूद्र हैं वे भी परम गति पा सकते हैं।” मानव जीवन का विशिष्ट उद्देश्य घर लौटना अर्थात् भगवान् के धाम को जाना है। यह सुविधा हर एक को मिलनी चाहिए, चाहे वह शूद्र हो या वैश्य, स्त्री हो या क्षत्रिय। कृष्णभावनामृत आन्दोलन का यही उद्देश्य है। किन्तु यदि कोई शूद्र बने रहने में सन्तुष्ट है, तो उसे इस श्लोक के अनुसार यातना भोगनी होगी—तद् एवातिबीभत्सितम् अश्नन्ति।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥