श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 26: नारकीय लोकों का वर्णन  »  श्लोक 24

 
श्लोक
ये त्विह वै श्वगर्दभपतयो ब्राह्मणादयो मृगयाविहारा अतीर्थे च मृगान्निघ्नन्ति तानपि सम्परेताँल्लक्ष्यभूतान् यमपुरुषा इषुभिर्विध्यन्ति ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
ये—वे जो; तु—लेकिन; इह—इस जीवन में; वै—या; श्व—कुत्तों; गर्दभ—तथा गधे के; पतय:—स्वामी; ब्राह्मण-आदय:— ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य; मृगया विहारा:—वन में आखेट करने में रुचि दिखाने वाले; अतीर्थे—बताये हुए से इतर; च—भी; मृगान्—पशुओं को; निघ्नन्ति—मारते हैं; तान्—उनको; अपि—निस्सन्देह; सम्परेतान्—मर कर; लक्ष्य-भूतान्—लक्ष्य बनाकर; यम-पुरुषा:—यमराज के दूत; इषुभि:—तीरों द्वारा; विध्यन्ति—बींधते हैं ।.
 
अनुवाद
 
 यदि इस जीवन में उच्च वर्ग का मनुष्य (ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य) कुत्ते, गधे तथा खच्चर पालता है और उन्हें जंगल में आखेट करने तथा वृथा ही पशुओं को मारने में अत्यधिक रुचि लेता है, तो मृत्यु के पश्चात् वह प्राणरोध नामक नरक में डाला जाता है। वहाँ पर यमराज के दूत उसे लक्ष्य बनाकर अपने तीरों से बेध डालते हैं।
 
तात्पर्य
 विशेषकर पाश्चात्य देशों में, सामन्त लोग जंगल में पशुओं का शिकार करने के लिए कुत्ते तथा घोड़े पालते हैं। चाहे पूर्व हो या पश्चिम, कलियुग में सामन्तवादी व्यक्ति जंगल में जाकर वृथा ही पशु-वध करते हैं। उच्च वर्ग के पुरुषों (ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य) को ब्रह्मज्ञान का
अनुशीलन करना चाहिए और शूद्रों को भी उस पद पर पहुँचने का अवसर देना चाहिए। यदि इसके बजाय वे आखेट में रत होते हैं, तो वे दण्डित होते हैं जैसाकि इस श्लोक में वर्णित है। वे यमदूतों के द्वारा न केवल बाणों से बिद्ध किये जाते हैं, वरन् पीब, मूत्र तथा मल के सागर में रखे जाते हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥