श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 26: नारकीय लोकों का वर्णन  »  श्लोक 25

 
श्लोक
ये त्विह वै दाम्भिका दम्भयज्ञेषु पशून् विशसन्ति तानमुष्मिँल्लोके वैशसे नरके पतितान्निरयपतयो यातयित्वा विशसन्ति ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
ये—जो पुरुष; तु—लेकिन; इह—इस जीवन में; वै—निस्सन्देह; दाम्भिका:—सम्पत्ति तथा प्रतिष्ठा से गर्वित; दम्भ-यज्ञेषु— प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए किये गये यज्ञ में; पशून्—पशुओं को; विशसन्ति—मारते हैं; तान्—उनको; अमुष्मिन् लोके—अगले जगत में; वैशसे—वैशस या विशसन; नरके—नरक में; पतितान्—गिरे हुए; निरय-पतय:—यमराज के दूत; यातयित्वा—प्रचुर पीड़ा प्रदान करके; विशसन्ति—मार डालते हैं ।.
 
अनुवाद
 
 जो व्यक्ति इस जन्म में अपने ऊँचे पद पर गर्व करता है और केवल भौतिक प्रतिष्ठा के लिए पशुओं की बलि चढ़ाता है, उसे मृत्यु के पश्चात् वैशसन नामक नरक में रखा जाता है। वहाँ यम के दूत उसे अपार कष्ट देकर अन्त में उसका वध कर देते हैं।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता (६.४१) में श्रीकृष्ण कहते हैं—शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते— “योगभ्रष्ट पुरुष पुण्यात्माओं के लोकों में अनेक वर्षों तक सुख भोगकर सदाचारी ब्राह्मणों अथवा धनवानों के प्रतिष्ठित कुल में जन्म लेता है।” ऐसा जन्म पाकर उसे चाहिए कि भक्तियोग को परिपूर्ण बनाये। किन्तु कुसंग के कारण वह प्राय: भूल जाता है कि श्रीभगवान् ने ही उसे यह प्रतिष्ठित पद प्रदान किया है। वह अनेक प्रकार के तथाकथित यज्ञ यथा कालीपूजा या दुर्गापूजा करके इसका दुरुपयोग करता है और निरीह पशुओं की बलि चढ़ाता है। ऐसे पुरुष को किस प्रकार दण्डित किया जाता है उसका वर्णन
इस श्लोक में हुआ है। इस श्लोक का एक शब्द दम्भयज्ञेषु महत्त्वपूर्ण है। यदि यज्ञ करते समय वैदिक शिक्षाओं का पालन नहीं किया जाता और केवल दिखावे के लिए पशुओं की बलि की जाती है, तो वह मृत्यु के उपरान्त दण्ड का भागी है। कलकत्ते में ऐसे अनेक कसाईघर हैं, जहाँ ऐसा मांस बिकता है जो देवी काली पर बलि चढ़ा होता है। शास्त्रों का मत है कि मास में एक बार देवी काली को छोटे बकरे की बलि दी जा सकती है। यह कहीं नहीं उल्लिखित है कि मन्दिर-पूजा के बहाने कसाईघर चलाया जाये और वृथा ही पशुओं का वध किया जाये। जो ऐसा करते हैं उन्हें दण्ड भोगना पड़ता है। जैसा कि यहाँ पर वर्णित है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥