श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 26: नारकीय लोकों का वर्णन  »  श्लोक 26

 
श्लोक
यस्त्विह वै सवर्णां भार्यां द्विजो रेत: पाययति काममोहितस्तं पापकृतममुत्र रेत:कुल्यायां पातयित्वा रेत: सम्पाययन्ति ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
य:—जो कोई; तु—लेकिन; इह—इस जीवन में; वै—निस्सन्देह; सवर्णाम्—उसी जाति की; भार्याम्—अपनी पत्नी को; द्विज:—उच्च जाति का व्यक्ति (यथा ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य); रेत:—वीर्य; पाययति—पीने को बाध्य करता है; काम- मोहित:—काम से मोहित; तम्—उसको; पाप-कृतम्—पाप करते हुए; अमुत्र—अगले जन्म में; रेत:-कुल्यायाम्—वीर्य की नदी में; पातयित्वा—फेंककर; रेत:—वीर्य; सम्पाययन्ति—पीने को बाध्य करते हैं ।.
 
अनुवाद
 
 यदि कोई मूर्ख द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य) भोगेच्छा से अपनी पत्नी को अपने वश में रखने के लिए उसे अपना वीर्य पीने को बाध्य करता है, तो मृत्यु के पश्चात् उसे लालाभक्ष नरक में रखा जाता है। वहाँ उसे वीर्य की नदी में डाल कर वीर्य पीने को विवश किया जाता है।
 
तात्पर्य
 अपना वीर्य पत्नी को पीने के लिए बाध्य करना इन्द्रजाल है, जिसे अत्यन्त कामी पुरुष अपनाते हैं। उनका कहना है कि ऐसा घृणित कार्य करने से पत्नी सदैव आज्ञाकारी बनी रहती है। सामान्यत: निम्न वर्ग के पुरुष
ही ऐसा करते हैं, किन्तु यदि उच्च वर्ग में जन्मा व्यक्ति ऐसा करता है, तो उसे मृत्यु के पश्चात् लालाभक्ष नरक में ले जाया जाता है, जहाँ शुक्र नदी में डुबाकर उसे वीर्य पीने को बाध्य किया जाता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥