श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 26: नारकीय लोकों का वर्णन  »  श्लोक 28

 
श्लोक
यस्त्विह वा अनृतं वदति साक्ष्ये द्रव्यविनिमये दाने वा कथञ्चित्स वै प्रेत्य नरकेऽवीचिमत्यध:शिरा निरवकाशे योजनशतोच्छ्रायाद् गिरिमूर्ध्न: सम्पात्यते यत्र जलमिव स्थलमश्मपृष्ठमवभासते तदवीचिमत्तिलशो विशीर्यमाणशरीरो न म्रियमाण: पुनरारोपितो निपतति ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
य:—जो; तु—लेकिन; इह—इस जीवन में; वा—अथवा; अनृतम्—असत्य, झूठ; वदति—बोलता है; साक्ष्ये—साक्षी देने में; द्रव्य-विनिमये—वस्तुओं के आदान-प्रदान में; दाने—दान देने में; वा—अथवा; कथञ्चित्—किसी प्रकार; स:—वह व्यक्ति; वै—निस्संदेह; प्रेत्य—मरकर; नरके—नरक में; अवीचिमति—अवीचिमत् नामक (जिसमें जल नहीं है); अध:-शिरा:— अधोमुख; निरवकाशे—आधारहीन; योजन-शत—आठ सौ मील की; उच्छ्रायात्—ऊँचाई वाला; गिरि—पर्वत की; मूर्ध्न:— चोटी से; सम्पात्यते—फेंक दिया जाता है; यत्र—जहाँ; जलम् इव—जल सदृश; स्थलम्—स्थल, भूमि; अश्म-पृष्ठम्—पथरीली सतह वाले; अवभासते—प्रतीत होता है; तत्—वह; अवीचिमत्—बिना जल या लहरों वाला; तिलश:—तिल के बीजों सदृश सूक्ष्म खंडों में; विशीर्यमाण—फाड़ा जा करके; शरीर:—देह; न म्रियमाण:—न मरने वाले; पुन:—फिर; आरोपित:—चोटी तक उठा हुआ; निपतति—नीचे गिरती है ।.
 
अनुवाद
 
 इस जीवन में जो व्यक्ति किसी की झूठी गवाही देने, व्यापार करते अथवा दान देते समय किसी भी तरह का झूठ बोलता है, वह मरने पर यमराज के दूतों द्वारा बुरी तरह से प्रताडि़त किया जाता है। ऐसा पापी व्यक्ति आठ सौ मील ऊँचे पर्वत की चोटी से मुँह के बल अवीचिमत् नामक नरक में नीचे फेंक दिया जाता है। इस नरक का कोई आधार नहीं होता और उस की पथरीली भूमि जल की लहरों के समान प्रतीत होती है, किन्तु इसमें जल नहीं है; इसलिए इसे अवीचिमत् (जलरहित) कहा गया है। वहाँ से बारम्बार गिराये जाने से उस पापी व्यक्ति के शरीर के छोटे छोटे टुकड़े हो जाने पर भी प्राण नहीं निकलते और उसे बारम्बार दण्ड सहना पड़ता है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥