श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 26: नारकीय लोकों का वर्णन  »  श्लोक 29

 
श्लोक
यस्त्विह वै विप्रो राजन्यो वैश्यो वा सोमपीथस्तत्कलत्रं वा सुरां व्रतस्थोऽपि वा पिबति प्रमादतस्तेषां निरयं नीतानामुरसि पदाऽऽक्रम्यास्ये वह्निना द्रवमाणं कार्ष्णायसं निषिञ्चन्ति ॥ २९ ॥
 
शब्दार्थ
य:—जो; तु—लेकिन; इह—इस जीवन में; वै—निस्सन्देह; विप्र:—विद्वान ब्राह्मण; राजन्य:—क्षत्रिय; वैश्य:—वैश्य; वा— अथवा; सोम-पीथ:—सोमरस पान करते हैं; तत्—उसकी; कलत्रम्—स्त्री; वा—अथवा; सुराम्—मदिरा; व्रत-स्थ:—व्रत रखने वाला; अपि—निश्चय ही; वा—अथवा; पिबति—पीता है; प्रमादत:—मोहवश; तेषाम्—उन सबों को; निरयम्—नरक तक; नीतानाम्—लाया जाकर; उरसि—वक्षस्थल पर; पदा—पैर से; आक्रम्य—प्रहार कर; अस्ये—मुँह में; वह्निना—अग्नि से; द्रवमाणम्—पिघलाया; कार्ष्णायसम्—लोह; निषिञ्चन्ति—उड़ेलते हैं ।.
 
अनुवाद
 
 जो ब्राह्मणी या ब्राह्मण मद्यपान करता है उसे यमराज के दूत अय:पान नामक नरक में ले जाते हैं। यदि कोई क्षत्रिय, वैश्य अथवा व्रत धारण करने वाला मोहवश सोमपान करता है, तो वह भी इस नरक में स्थान पाता है। अय:पान नरक में यम के दूत उनकी छाती पर चढ़ कर उनके मुँह के भीतर तप्त पिघला लोहा उड़ेलते हैं।
 
तात्पर्य
 मनुष्य को केवल नाम का ही ब्राह्मण नहीं होना चाहिए और न ही सभी प्रकार के पापकर्म, विशेष रूप से मद्यपान करना चाहिए। ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य जनों
को चाहिए कि अपने वर्णानुसार आचरण करें। यदि वे पतित होकर मद्यपान के आदी अर्थात् शूद्र बन जाते हैं, तो उन्हें यहाँ वर्णित विधि से दण्डित किया जाएगा।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥