श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 26: नारकीय लोकों का वर्णन  »  श्लोक 31

 
श्लोक
ये त्विह वै पुरुषा: पुरुषमेधेन यजन्ते याश्च स्त्रियो नृपशून्खादन्ति तांश्च ते पशव इव निहता यमसदने यातयन्तो रक्षोगणा: सौनिका इव स्वधितिनावदायासृक्‌पिबन्ति नृत्यन्ति च गायन्ति च हृष्यमाणा यथेह पुरुषादा: ॥ ३१ ॥
 
शब्दार्थ
ये—जो व्यक्ति; तु—लेकिन; इह—इस जीवन में; वै—निस्सन्देह; पुरुषा:—व्यक्ति; पुरुष-मेधेन—नरबलि द्वारा; यजन्ते— आराधना (देवी काली या भद्रकाली की) करते हैं; या:—जो; च—तथा; स्त्रिय:—स्त्रियाँ; नृ-पशून्—बलि चढ़ाये जाने वाले मनुष्य; खादन्ति—खाते हैं; तान्—उनको; च—तथा; ते—वे; पशव: इव—पशुओं के सदृश; निहता:—मारे जाकर; यम- सदने—यमराज के धाम में; यातयन्त:—दण्ड देते हुए; रक्ष:-गणा:—राक्षस होकर; सौनिका:—मानने वाले; इव—इदृश; स्वधितिना—तलवार से; अवदाय—खण्ड-खण्ड करके; असृक्—रक्त; पिबन्ति—पीते हैं; नृत्यन्ति—नाचते हैं; च—तथा; गायन्ति—गाते हैं; च—भी; हृष्यमाणा:—प्रसन्न होकर; यथा—जिस प्रकार; इह—इस लोक में; पुरुष-अदा:—मनुष्य-भक्षी ।.
 
अनुवाद
 
 इस संसार में ऐसे भी पुरुष तथा स्त्रियाँ हैं, जो भैरव या भद्रकाली को नर-बलि चढ़ाकर अपने द्वारा बलि किए गये शिकार का मांस खाते हैं। ऐसे यज्ञ करने वालों को मृत्यु के पश्चात् यमलोक में ले जाया जाता है जहाँ उनके शिकार (मारे गये व्यक्ति) राक्षस का रूप धारण करके अपनी तेज तलवारों से उनके टुकड़े-टुकड़े कर डालते हैं। जिस प्रकार इस लोक में नर भक्षकों ने नाचते गाते हुए अपने शिकार का रक्तपान किया था उसी तरह उनके शिकार अब अपने वध करने वालों का रक्तपान करके आनन्दित होते हैं।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥