श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 26: नारकीय लोकों का वर्णन  »  श्लोक 32

 
श्लोक
ये त्विह वा अनागसोऽरण्ये ग्रामे वा वैश्रम्भकैरुपसृतानुपविश्रम्भय्य जिजीविषून् शूलसूत्रादिषूपप्रोतान्क्रीडनकतया यातयन्ति तेऽपि च प्रेत्य यमयातनासु शूलादिषु प्रोतात्मान: क्षुत्तृड्भ्यां चाभिहता: कङ्कवटादिभिश्चेतस्ततस्तिग्मतुण्डैराहन्यमाना आत्मशमलं स्मरन्ति ॥ ३२ ॥
 
शब्दार्थ
ये—जो; तु—लेकिन; इह—इस जीवन में; वा—अथवा; अनागस:—निर्दोष; अरण्ये—वन में; ग्रामे—गाँव में; वा—अथवा; वैश्रम्भकै:—श्रद्धा के द्वारा; उपसृतान्—पास लाये जाकर; उपविश्रम्भय्य—विश्वास के साथ प्रेरणा देकर; जिजीविषून्—जो रक्षित होना चाहते हैं; शूल-सूत्र-आदिषु—बर्छा, धागा आदि पर; उपप्रोतान्—लगा हुआ; क्रीडनकतया—गेंद के सदृश; यातयन्ति—पीड़ा पहुँचाते हैं; ते—वे पुरुष; अपि—निश्चय ही; च—तथा; प्रेत्य—मरने के पश्चात्; यम-यातनासु—यमराज की यातनाएँ; शूल-आदिषु—बर्छे आदि पर; प्रोत-आत्मान:—जिनके शरीर जड़ दिये गये हैं; क्षुत्-तृड्भ्याम्—भूख तथा प्यास से; च—भी; अभिहता:—अभिभूत; कङ्क-वट-आदिभि:—बगुला तथा गीध जैसे पक्षियों द्वारा; च—तथा; इत: तत:—इधर-उधर; तिग्म-तुण्डै:—तीखी चोंचों वाले; आहन्यमाना:—मारे जाकर; आत्म-शमलम्—अपने पापकर्मों को; स्मरन्ति—स्मरण करते हैं ।.
 
अनुवाद
 
 इस जीवन में कुछ व्यक्ति गाँव या वन में रक्षा के लिए आये हुए पशुओं तथा पक्षियों को शरण देते हैं और उन्हें अपनी सुरक्षा का विश्वास हो जाने के बाद उन्हें बर्छे या डोरे में फाँस कर घोर पीड़ा पहुँचाकर उनसे खिलौने जैसा खेलते हैं। ऐसे व्यक्ति मृत्यु के पश्चात् यमराज के दूतों द्वारा शूलप्रोत नामक नरक में ले जाये जाते हैं जहाँ उनके शरीरों को तीक्ष्ण नुकीले भालों से छेदा जाता है। वे भूख तथा प्यास से तड़पते रहते हैं और उनके शरीरों को गीध तथा बगुले जैसे तीक्ष्ण चोंच वाले पक्षी चारों ओर से नोंचते हैं। इस प्रकार से यातना पाकर उन्हें पूर्वजन्म में किये गये पाप-कर्मों का स्मरण होता है।
 
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥