श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 26: नारकीय लोकों का वर्णन  »  श्लोक 38

 
श्लोक
निवृत्तिलक्षणमार्ग आदावेव व्याख्यात: । एतावानेवाण्डकोशो यश्चतुर्दशधा पुराणेषु विकल्पित उपगीयते यत्तद्भ‍गवतो नारायणस्य साक्षान्महापुरुषस्य स्थविष्ठं रूपमात्ममायागुणमयमनुवर्णितमाद‍ृत: पठति श‍ृणोति श्रावयति स उपगेयं भगवत: परमात्मनोऽग्राह्यमपि श्रद्धाभक्तिविशुद्धबुद्धिर्वेद ॥ ३८ ॥
 
शब्दार्थ
निवृत्ति-लक्षण-मार्ग:—त्याग अथवा मुक्ति का मार्ग; आदौ—प्रारम्भ में (द्वितीय तथा तृतीय स्कन्धों में); एव—निस्संदेह; व्याख्यात:—कहा जा चुका है; एतावान्—यह सब; एव—निश्चय ही; अण्ड-कोश:—यह ब्रह्माण्ड जो एक बृहद् अंडे के सदृश है; य:—जो; चतुर्दश-धा—चौदह खण्डों में; पुराणेषु—पुराणों में; विकल्पित:—विभक्त; उपगीयते—वर्णित; यत्—जो; तत्—वह; भगवत:—श्रीभगवान् का; नारायणस्य—नारायण का; साक्षात्—प्रत्यक्ष; महा-पुरुषस्य—परम पुरुष का; स्थविष्ठम्—स्थूल; रूपम्—रूप; आत्म-माया—अपनी शक्ति का; गुण—गुणों का; मयम्—युक्त; अनुवर्णितम्—वर्णित; आदृत:—आदरपूर्वक; पठति—पढ़ता है; शृणोति—अथवा सुनता है; श्रावयति—अथवा व्याख्या करता है; स:—वह पुरुष; उपगेयम्—गीत; भगवत:—श्रीभगवान् का; परमात्मन:—परमात्मा का; अग्राह्यम्—जिसका समझ पाना कठिन है; अपि— यद्यपि; श्रद्धा—श्रद्धा; भक्ति—तथा भक्ति से; विशुद्ध—शुद्ध; बुद्धि:—जिसकी बुद्धि; वेद—जानती है ।.
 
अनुवाद
 
 प्रारम्भ में (द्वितीय तथा तृतीय स्कंन्ध में) मैं यह बता चुका हूँ कि मुक्तिमार्ग पर किस प्रकार अग्रसर हुआ जा सकता है। पुराणों में चौदह खण्डों में विभक्त अंड सदृश विशाल ब्रह्माण्ड की स्थिति का वर्णन किया गया है। यह विराट रूप भगवान् का बाह्य शरीर माना जाता है, जिसकी उत्पत्ति उनकी शक्ति और गुणों से हुई है। इसे ही सामान्यत: विराट रूप कहते हैं। यदि कोई श्रद्धा सहित भगवान् के इस बाह्य रूप का वर्णन पढ़ता है, अथवा इसके विषय में सुनता या फिर अन्यों को भागवत धर्म अथवा कृष्णभावनामृत समझाता है, तो आत्म-चेतना अथवा कृष्णभावनामृत में उनकी श्रद्धा तथा भक्ति क्रमश: बढ़ती जाती है। यद्यपि इस भावना को विकसित कर पाना कठिन है, किन्तु इस विधि से मनुष्य अपने को शुद्ध कर सकता है और धीरे-धीरे परम सत्य को जान सकता है।
 
तात्पर्य
 कृष्णभावनामृत आन्दोलन द्वारा श्रीमद्भागवतम् का प्रकाशन विशेषत: आधुनिक सभ्य मानवों के लाभार्थ किया जा रहा है, जिससे वह मूल भावना को जाग्रत कर सके। इस चेतना के बिना मनुष्य पूर्ण अंधकार में भटकता है। मनुष्य चाहे स्वर्ग को जाये या
नरक को, वह अपना समय नष्ट ही करता है। अत: उसे चाहिए कि श्रीमद्भागवत में वर्णित भगवान् के विराट रूप के विषय में सुने। इससे वह अपने आपको बद्ध जीवन से बचा सकेगा और धीरे-धीरे मुक्तिमार्ग की ओर उठते हुए भगवान् के धाम को वापस जा सकेगा।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥