श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 26: नारकीय लोकों का वर्णन  »  श्लोक 39

 
श्लोक
श्रुत्वा स्थूलं तथा सूक्ष्मं रूपं भगवतो यति: ।
स्थूले निर्जितमात्मानं शनै: सूक्ष्मं धिया नयेदिति ॥ ३९ ॥
 
शब्दार्थ
श्रुत्वा—सुनकर(गुरु-परम्परा से); स्थूलम्—स्थूल; तथा—और; सूक्ष्मम्—सूक्ष्म; रूपम्—रूप; भगवत:—श्रीभगवान् का; यति:—संन्यासी या भक्त; स्थूले—स्थूल रूप; निर्जितम्—विजित; आत्मानम्—मन को; शनै:—धीरे-धीरे; सूक्ष्मम्—भगवान् के सूक्ष्म रूप में; धिया—बुद्धि से; नयेत्—ले जाना चाहिए; इति—इस प्रकार ।.
 
अनुवाद
 
 जो मुक्ति का इच्छुक है, मुक्ति के पथ को ग्रहण करता है तथा बद्ध जीवन के प्रति आकृष्ट नहीं होता, वह यती या भक्त कहलाता है। ऐसे पुरुष को पहले भगवान् के स्थूल विराट रूप का चिन्तन करते हुए मन को वश में करना चाहिए और तब धीरे-धीरे श्रीकृष्ण के दिव्य रूप (सत्- चित्-आनन्द-विग्रह) का चिन्तन करना चाहिए। इस प्रकार उसका मन समाधि में स्थिर हो जाता है। भक्ति के द्वारा भगवान् के सूक्ष्म रूप का साक्षात्कार किया जा सकता है और यही भक्तों का गन्तव्य है। इस प्रकार उसका जीवन सफल बन जाता है।
 
तात्पर्य
 कहा गया है कि—महत्सेवां द्वारं आहुर्विमुक्ते:—यदि कोई मुक्तिमार्ग पर आगे बढऩा चाहता है, तो उसे महात्माओं या मुक्त भक्तों की संगति करनी चाहिए, क्योंकि ऐसी संगति में श्रीभगवान् के नाम, रूप, गुण तथा साज-सामग्री के सम्बन्ध में श्रवण, वर्णन तथा कीर्तन का अवसर प्राप्त होता है जिन सबका वर्णन श्रीमद्भागवत
में हुआ है। बन्धन पथ पर सदैव जन्म-मृत्यु का चक्कर लगा रहता है। जो इस बन्धन से मुक्ति चाहता है उसे अन्तर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ में सम्मिलित हो जाना चाहिए और भक्तों से श्रीमद्भागवत सुनने का लाभ उठाना चाहिए तथा कृष्णभावनामृत का प्रसार करने के लिए इसका वर्णन भी करना चाहिए।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥