श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 26: नारकीय लोकों का वर्णन  »  श्लोक 5

 
श्लोक
ऋषिरुवाच
अन्तराल एव त्रिजगत्यास्तु दिशि दक्षिणस्यामधस्ताद्भ‍ूमेरुपरिष्टाच्च जलाद्यस्यामग्निष्वात्तादय: पितृगणा दिशि स्वानां गोत्राणां परमेण समाधिना सत्या एवाशिष आशासाना निवसन्ति ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
ऋषि: उवाच—ऋषि ने उत्तर दिया; अन्तराले—मध्यवर्ती स्थान में; एव—निश्चय ही; त्रि-जगत्या:—तीनों लोकों के; तु— लेकिन; दिशि—दिशा; दक्षिणस्याम्—दक्षिणी; अधस्तात्—नीचे; भूमे:—पृथ्वी पर; उपरिष्टात्—थोड़ा ऊपर; च—तथा; जलात्—गर्भोदक सागर से; यस्याम्—जिसमें; अग्निष्वात्ता-आदय:—अग्निष्वात्ता इत्यादि; पितृ-गणा:—पितर-गण; दिशि—दिशा में; स्वानाम्—उनके अपने; गोत्राणाम्—परिवार के; परमेण—अत्यधिक; समाधिना—भगवान् के ध्यान में मग्न होकर; सत्या:—सत्य में; एव—निश्चय ही; आशिष:—आशीर्वाद; आशासाना:—कामना करने वाले; निवसन्ति—रहते हैं ।.
 
अनुवाद
 
 महर्षि शुकदेव गोस्वामी ने उत्तर दिया—सभी नरकलोक तीनों लोकों तथा गर्भोदक सागर के मध्य में स्थित हैं। वे ब्रह्माण्ड के दक्षिण की ओर भूमण्डल के नीचे तथा गर्भोदक सागर के जल से थोड़ा ऊपर स्थित हैं। पितृलोक भी इसी गर्भोदक सागर तथा अध:लोकों के मध्य के प्रदेश में स्थित है, जिसमें अग्निष्वात्ता आदि समस्त पितृलोक के वासी परम समाधि में लीन होकर भगवान् का ध्यान करते हैं और सदैव अपने गोत्र (परिवारों) की मंगल-कामना करते हैं।
 
तात्पर्य
 जैसाकि पहले बताया जा चुका है, हमारे लोक के नीचे सात अध:लोक हैं जिनमें सबसे नीचे के लोक को पाताललोक कहा जाता है। पाताललोक के नीचे अन्य
लोक हैं, जिन्हें नरकलोक कहते हैं। ब्रह्माण्ड के नीचे गर्भोदक सागर फैला हुआ है, अत: पाताललोक तथा गर्भोदक सागर के मध्य ही नरकलोक हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥