श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 26: नारकीय लोकों का वर्णन  »  श्लोक 6

 
श्लोक
यत्र ह वाव भगवान् पितृराजो वैवस्वत: स्वविषयं प्रापितेषु स्वपुरुषैर्जन्तुषु सम्परेतेषु यथाकर्मावद्यं दोषमेवानुल्लङ्घितभगवच्छासन: सगणो दमं धारयति ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
यत्र—जहाँ; ह वाव—निस्संदेह; भगवान्—सर्वशक्तिमान; पितृ-राज:—यमराज, पितरों के राजा; वैवस्वत:—सूर्यदेव के पुत्र; स्व-विषयम्—अपना राज्य; प्रापितेषु—पहुँच जाने पर; स्व-पुरुषै:—अपने दूतों द्वारा; जन्तुषु—मानव प्राणी; सम्परेतेषु—मृत; यथा-कर्म-अवद्यम्—बद्ध जीवन के नियमों तथा विधानों के उल्लंघन की मात्रा के अनुसार; दोषम्—दोष, त्रुटि; एव—निश्चय ही; अनुल्लङ्घित-भगवत्-शासन:—जो श्रीभगवान् के आदेश का कभी भी उल्लंघन नहीं करता; सगण:—अपने अनुचरों सहित; दमम्—दण्ड; धारयति—देता है ।.
 
अनुवाद
 
 पितरों के राजा यमराज हैं जो सूर्यदेव के अत्यन्त शक्तिशाली पुत्र हैं। वह अपने गणों सहित पितृलोक में रहते हैं और भगवान् द्वारा निर्धारित नियमों का पालन करते हुए यमदूत समस्त पापियों को मृत्यु के पश्चात् उनके पास ले आते हैं। अपने कार्यक्षेत्र में लाए जाने के पश्चात् उनके विशेष पापकर्मों के अनुसार यमराज अपना निर्णय देकर उनको समुचित दंड हेतु अनेक नरकों में से किसी एक में भेज देते हैं।
 
तात्पर्य
 यमराज कोई काल्पनिक या पौराणिक पात्र नहीं; वह अपने धाम पितृलोक का स्वामी है। नास्तिकतावादी भले ही नरक में विश्वास न करते हों, किन्तु शुकदेव गोस्वामी नरक-लोकों के अस्तित्व की पुष्टि करते हैं। ये नरक गर्भोदक सागर तथा पाताललोक के मध्य स्थित हैं। यमराज की नियुक्ति श्रीभगवान् ने यह देखने के लिए की है कि मानव प्राणी उनके नियमों का उल्लंघन न करें। इसकी पुष्टि भगवद्गीता (४.१७) में की गई है—
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मण:।

अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गति: ॥

“कर्म की गूढ़ताओं को समझ पाना कठिन है, अत: मनुष्य को चाहिए कि वह कर्म, विकर्म तथा अकर्म के स्वरूप को भली भाँति जाने।” मनुष्य को चाहिए कि वह कर्म, विकर्म तथा अकर्म की प्रकृति को समझकर उसी के अनुसार कार्य करे। यही श्रीभगवान् का नियम है। जो बद्धजीव इस जगत में इन्द्रियभोग के उद्देश्य से आये हैं, उन्हें कतिपय विधि-विधानों के अन्तर्गत इन्द्रियभोग करने दिया जाता है। यदि वे इन विधानों का उल्लंधन करते हैं, तो इसकी परख की जाती है और उन्हें यमराज द्वारा दण्ड दिया जाता है। वह उन्हें नरकलोक में ले जाता है और कृष्णभावनामृत में पुन: ले आने के लिए उन्हें दण्डित करके अपराध मुक्त करता है। किन्तु माया के वशीभूत होकर बद्धजीव तमोगुण से पूर्ण रहते हैं। इस प्रकार यमराज द्वारा पुन: पुन: दण्डित होकर भी वे होश नहीं सँभाल पाते और बारम्बार पापकर्म करते हुए भौतिक स्थिति में रहते जाते हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥