श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 26: नारकीय लोकों का वर्णन  »  श्लोक 7

 
श्लोक
तत्र हैके नरकानेकविंशतिं गणयन्ति अथ तांस्ते राजन्नामरूपलक्षणतोऽनुक्रमिष्यामस्तामिस्रोऽन्धतामिस्रो रौरवो महारौरव: कुम्भीपाक: कालसूत्रमसिपत्रवनं सूकरमुखमन्धकूप: कृमिभोजन: सन्दंशस्तप्तसूर्मिर्वज्रकण्टकशाल्मली वैतरणी पूयोद: प्राणरोधो विशसनं लालाभक्ष: सारमेयादनमवीचिरय:पानमिति । किञ्च क्षारकर्दमो रक्षोगणभोजन: शूलप्रोतो दन्दशूकोऽवटनिरोधन: पर्यावर्तन: सूचीमुखमित्यष्टाविंशतिर्नरका विविधयातनाभूमय: ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
तत्र—वहाँ; ह—निश्चय ही; एके—कोई कोई; नरकान्—नरकों को; एक-विंशतिम्—इक्कीस; गणयन्ति—गिनते हैं; अथ— अत:; तान्—उनको; ते—तुमको; राजन्—हे राजन्; नाम-रूप-लक्षणत:—नामों, रूपों तथा लक्षणों के अनुसार; अनुक्रमिष्याम:—मैं क्रम से वर्णन करूँगा; तामिस्र:—तामिस्र; अन्ध-तामिस्र:—अन्धतामिस्र; रौरव:—रौरव; महा-रौरव:— महारौरव; कुम्भी-पाक:—कुम्भीपाक; काल-सूत्रम्—कालसूत्र; असि-पत्रवनम्—असिपत्रवन; सूकर-मुखम्—सूकरमुख; अन्ध-कूप:—अन्धकूप; कृमि-भोजन:—कृमिभोजन; सन्दंश:—सन्दंश; तप्त-सूर्मि:—तप्तसूर्मि; वज्र-कण्टक-शाल्मली— वज्रकंटक-शाल्मली; वैतरणी—वैतरणी; पूयोद:—पूयोद; प्राण-रोध:—प्राणरोध; विशसनम्—विशसन; लाला-भक्ष:— लालाभक्ष; सारमेयादनम्—सारेमेयादन; अवीचि:—अवीचि; अय:-पानम्—अय:पान; इति—इस प्रकार; किञ्च—कुछ और; क्षार-कर्दम:—क्षारकर्दम; रक्ष:-गण-भोजन:—रक्षोगणभोजन; शूल-प्रोत:—शूलप्रोत; दन्द-शूक:—न्दशूक; अवट निरोधन:—अवटनिरोधन; पर्यावर्तन:—पर्यावर्तन; सूची-मुखम्—सूचीमुख; इति—इस तरह; अष्टा-विंशति:—अट्ठाईस; नरका:—नरकलोक; विविध—विभिन्न; यातना-भूमय:—नारकीय यातना वाले स्थल ।.
 
अनुवाद
 
 कुछ विद्वान नरक लोकों की कुल संख्या इक्कीस बताते हैं, तो कुछ अट्ठाईस। हे राजन्, मैं क्रमश: उनके नाम, रूप तथा लक्षणों का वर्णन करूँगा। विभिन्न नरकों के नाम ये हैं—तामिस्र, अन्धतामिस्र, रौरव, महारौरव, कुम्भीपाक, कालसूत्र, असिपत्रवन, सूकरमुख, अन्धकूप, कृमिभोजन, सन्दंश, तप्तसूर्मि, वज्रकंटक-शाल्मली, वैतरणी, पूयोद, प्राणरोध, विशसन, लालाभक्ष, सारमेयादन, अवीचि, अय:पान, क्षारकर्दम, रक्षोगणभोजन, शूलप्रोत, दन्दशूक, अवटनिरोधन, पर्यावर्तन तथा सूचीमुख। ये सभी लोक जीवात्माओं को दण्डित करने के लिए हैं।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥