श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 26: नारकीय लोकों का वर्णन  »  श्लोक 9

 
श्लोक
एवमेवान्धतामिस्रे यस्तु वञ्चयित्वा पुरुषं दारादीनुपयुङ्क्ते यत्र शरीरी निपात्यमानो यातनास्थो वेदनया नष्टमतिर्नष्टद‍ृष्टिश्च भवति यथा वनस्पतिर्वृश्‍च्यमानमूलस्तस्मादन्धतामिस्रं तमुपदिशन्ति ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस प्रकार; एव—ही; अन्धतामिस्रे—अन्धतामिस्र नरक में; य:—जो व्यक्ति; तु—लेकिन; वञ्चयित्वा—ठग कर; पुरुषम्—दूसरे व्यक्ति को; दार-आदीन्—पत्नी तथा सन्तान; उपयुङ्क्ते—भोग करता है; यत्र—जहाँ; शरीरी—शरीरधारी व्यक्ति; निपात्यमान:—बलपूर्वक फेंका जाकर; यातना-स्थ:—अत्यन्त दयनीय स्थिति में रहकर; वेदनया—ऐसी वेदना से; नष्ट मति:— जिनकी बुद्धि नष्ट हो गई है; नष्ट दृष्टि:—जिनकी दृष्टि क्षीण हो चुकी है; च—भी; भवति—हो जाता है; यथा—जितना कि; वनस्पति:—वृक्ष; वृश्च्यमान—काटे जाने पर; मूल:—जिनकी जड़; तस्मात्—इस कारण; अन्धतामिस्रम्—अन्धतामिस्र; तम्—उसको; उपदिशन्ति—कहते हैं ।.
 
अनुवाद
 
 जो व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को धोखा देकर उसकी पत्नी तथा सन्तान को भोगता है वह अन्धतामिस्र नामक नरक में स्थान पाता है। वहाँ पर उसकी स्थिति जड़ से काटे गए वृक्ष जैसी होती है। अंधतामिस्र में पहुँचने के पूर्व ही पापी जीव को अनेक कठिन यातनाएँ सहनी पड़ती हैं। ये यातनाएँ इतनी कठोर होती हैं कि वह बुद्धि तथा दृष्टि दोनों को खो बैठता है। इसी कारण से बुद्धिमान जन इस नरक को अन्धतामिस्र कहते हैं।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥