श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 26: नारकीय लोकों का वर्णन  » 

 
संक्षेप विवरण
 
 इस अध्याय में यह बताया गया है कि पापी मनुष्य किस प्रकार विभिन्न नरकों में जाता है जहाँ यमदूत विविध प्रकार से उसे दण्ड देते हैं। जैसाकि भगवद्गीता (३.२७) में कहा गया है—
प्रकृते: क्रियमाणानि गुणै: कर्माणि सर्वश:।

अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥

“मोहग्रस्त जीवात्मा भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों के वशीभूत होकर अपने को ही सारे कार्यों का कर्ता सोचता है जो कि वास्तव में प्रकृति द्वारा सम्पन्न होते हैं।” मूर्ख व्यक्ति अपने आपको नियमों से मुक्त मानता है। वह सोचता है कि न तो ईश्वर है और न ही कोई नियामक सिद्धान्त हैं और वह जो चाहे कर सकता है। इस प्रकार वह अनेक पापकर्म करता है, जिसके कारण उसे जन्म-जन्मांतर विभिन्न नारकीय परिस्थितियों में रखा जाता है, जिससे प्रकृति के नियमानुसार उसे दण्डित किया जा सके। प्रकृति के नियमों के वश में रह कर भी वह अज्ञानतावश अपने को स्वतंत्र मानता है और उसकी यातना का यही मूल सिद्धान्त है। ये नियम तीन गुणों के प्रभाव के अन्तर्गत कार्य करते हैं और इसीलिए प्रत्येक मनुष्य भी तीन प्रकार के प्रभावों के अन्तर्गत कार्य करता है। अपने कर्मों के अनुसार वह इस जीवन में या अगले जीवन में विभिन्न कर्मफलों की यातनाएँ भोगता है। धार्मिक पुरुष नास्तिकों से भिन्न रीति से कार्य करते हैं, अत: वे भिन्न प्रकार से कर्मफल भोगते हैं।

शुकदेव गोस्वामी ने निम्नलिखित अट्ठाईस प्रकार के नरकों का वर्णन किया है—तामिस्र, अन्धतामिस्र, रौरव, महारौरव, कुम्भीपाक, कालसूत्र, असिपत्रवन, शूकरमुख, अन्धकूप, कृमिभोजन, संन्दश, तप्तसूर्मि, वज्रकण्टक-शाल्मली, वैतरणी, पूयोद, प्राणरोध, विशसन, लालाभक्ष, सारमेयादन, अवीचि, अय:पान, क्षारकर्दम, रक्षोगणभोजन, शूलप्रोत, दंशशूक, अवटनिरोधन, पर्यावर्तन तथा सूचीमुख।

यदि कोई व्यक्ति दूसरे का धन, पत्नी या सम्पत्ति चुराता है, तो उसे तामिस्र नामक नरक में डाला जाता है। यदि कोई ठग कर पराई स्त्री का उपभोग करता है, तो उसे अन्धतामिस्र नरक की कठिन यातना सहनी पड़ती है। उस मूढ़ पुरुष के जो शरीर में ही व्यस्त रह कर और इसी सिद्धान्त के आधार पर अन्य जीवात्माओं की हिंसा करके अपना तथा अपने परिवार का पालन करता है रौरव नामक नरक में डाला जाता है। वहाँ पर उसके द्वारा वध किये गये पशु रुरु नामक प्राणियों के रूप में जन्म लेकर उसे पीडि़त करते रहते हैं। जो विभिन्न पशुओं तथा पक्षियों को मारकर पकाते हैं उन्हें यमराज के दूत कुम्भीपाक नामक नरक में रखते हैं जहाँ उन्हें उबलते तेल में डाल दिया जाता है। ब्राह्मण का वध करने वाले को कालसूत्र नामक नरक में डाला जाता है जहाँ की भूमि समतल तथा ताम्र से बनी होती है और भट्ठी के समान गर्म रहती है। ब्राह्मणहन्ता उस प्रदेश में अनेक वर्षों तक जलता रहता है। धार्मिक नियमों का पालन न करने वाले तथा मनमानी करने वाले को या जो किसी दुष्ट का अनुयायी होता है, उसे असिपत्रवन नरक में रखा जाता है। जो अधिकारी न्याय करने में गलती करता है अथवा जो निर्दोष को दण्डित करता है उसे यमराज के दूत शूकरमुख नामक नरक में ले जाकर अत्यन्त क्रूरता से पीटते हैं।

भगवान् ने मनुष्य को उच्च कोटि की चेतना प्रदान की है, अत: वह अन्य प्राणियों के कष्टों तथा सुखों का अनुभव कर सकता है। विवेक से रहित मनुष्य की अन्य प्राणियों को कष्ट पहुँचाने की प्रवृत्ति होती है। यमराज के दूत ऐसे पुरुष को अन्धकूप नामक नरक में ले जाते हैं जहाँ वह अपने पीडि़तों के द्वारा उचित दण्ड पाता है। जो व्यक्ति अतिथि का उचित सत्कार नहीं करता या उसे भोजन नहीं कराता, किन्तु स्वयं भोजन करता है उसे कृमिभोजन नरक प्राप्त होता है जहाँ उसे असंख्य कीड़े-मकोड़े लगातार काटते हैं।

चोर को संदंश नामक नरक की प्राप्ति होती है। अभोग्य स्त्री के साथ यौन सम्बन्ध बनाने वाले व्यक्ति को तप्तसूर्मि नामक नरक में भेजा जाता है। जो व्यक्ति पशुओं के साथ यौन-संसर्ग करता है उसे वजकण्टक-शाल्मली नामक नरक में डाला जाता है। उच्चकुल में जन्म लेकर तदनुकूल कार्य न करने वाले व्यक्ति को रक्त, पूय तथा मूत्र की वैतरणी नदी में रखा जाता है। पशु की भाँति रहने वाले व्यक्ति को पूयोद नरक में एवं वन के पशुओं का बिना स्वीकृति के क्रूरतापूर्वक वध करने वाले को प्राणरोध नरक में रखा जाता है। जो व्यक्ति धर्म के नाम पर पशु-हत्या करता है उसे विशसन नरक में और जो अपनी पत्नी को अपना वीर्य पीने के लिए बाध्य करता है उसे लालाभक्ष नरक में भेजा जाता है। जो किसी के घर में आग लगाता है या किसी को विष देता है उसे सारमेयादन नामक नरक में रखा जाता है। झूठी गवाही देकर जीविका चलाने वाले को अवीचि नरक भोगना पड़ता है।

मद्यपान करने वाले को अय:पान नरक में तथा जो बड़ों के प्रति आदरभाव नहीं प्रकट करता उसे क्षारकर्दम नरक में रखा जाता है। भैरव को नर-बलि देने वाले पुरुष को रक्षोगणभोजन नामक नरक में तथा पालतू पशुओं को मारने वाले को शूलप्रोत नरक में रखा जाता है। अन्यों को सताने वाले व्यक्ति को दंदशूक में तथा जीवित प्राणी को गुफा के भीतर बन्द रखने वाले व्यक्ति को अवट-निरोधन नामक नरक में रखा जाता है। जो व्यक्ति अपने घर में आए अतिथि पर अनावश्यक क्रोध करता है उसे पर्यावर्तन नरक में तथा धन से मदान्ध तथा और धन संचय का चिन्तन करने वाले व्यक्ति को सूचीमुख नरक में भेजा दिया जाता है।

इन नरकों के वर्णन के पश्चात् शुकदेव गोस्वामी बताते हैं कि पवित्र पुरुष किस प्रकार देवताओं के वास स्वर्गलोक को जाते हैं और पुण्यों के क्षीण होने पर किस प्रकार इस पृथ्वी पर पुन: आते हैं। अन्त में वे भगवान् के विराट रूप का वर्णन करते हैं और उनके कार्यों की महिमा बताते हैं।

 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥