श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 3: राजा नाभि की पत्नी मेरुदेवी के गर्भ से ऋषभदेव का जन्म  »  श्लोक 16

 
श्लोक
श्रीशुक उवाच
इति निगदेनाभिष्टूयमानो भगवाननिमिषर्षभो वर्षधराभिवादिताभिवन्दितचरण: सदयमिदमाह ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-शुक: उवाच—श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति—इस प्रकार; निगदेन—गद्य स्तुति द्वारा; अभिष्टूयमान:—आराधित होकर; भगवान्—भगवान्; अनिमिष-ऋषभ:—समस्त देवताओं में प्रमुख; वर्ष-धर—भारतवर्ष के सम्राट् राजा नाभिद्वारा; अभिवादित—पूजित होकर; अभिवन्दित—झुककर; चरण:—जिनके पाँव; सदयम्—कृपापूर्वक; इदम्—यह; आह—कहा ।.
 
अनुवाद
 
 श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा—भारतवर्ष के सम्राट, राजा नाभि द्वारा पूजित ऋत्विजों ने गद्य में (सामान्यत: पद्य में) ईश्वर की स्तुति की और वे सभी उनके चरणकमलों पर झुक गये। देवताओं के अधिपति, परमेश्वर उनसे अत्यन्त प्रसन्न हुए और वे इस प्रकार बोले।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥