श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 3: राजा नाभि की पत्नी मेरुदेवी के गर्भ से ऋषभदेव का जन्म  »  श्लोक 7

 
श्लोक
अथानयापि न भवत इज्ययोरुभारभरया समुचितमर्थमिहोपलभामहे ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
अथ—अन्यथा; अनया—यह; अपि—भी; न—नहीं; भवत:—आपका; इज्यया—यज्ञ द्वारा; उरुभार-भरया—तमाम सामग्री के भार से बोझिल; समुचितम्—वांछित, आवश्यक; अर्थम्—उपयोग; इह—यहाँ; उपलभामहे—हम देखते हैं ।.
 
अनुवाद
 
 हमने आपकी पूजा में आपको अनेक वस्तुएँ अर्पित की हैं और आपके लिए अनेक यज्ञ किये हैं, किन्तु हम सोचते हैं कि आपको प्रसन्न करने के लिए इतने सारे आयोजनों की कोई आवश्यकता नहीं है।
 
तात्पर्य
 श्रील रूप गोस्वामी का कहना है कि यदि बिना भूख के किसी के सामने ढेर सारा भोजन रख दिया जाये तो उसका कोई महत्त्व नहीं होता। बड़े-बड़े याज्ञिक अनुष्ठानों में भगवान् को तुष्ट करने के लिए अनेक वस्तुएँ एकत्र की जाती हैं, किन्तु यदि ईश्वर के प्रति लगाव या प्रेम नहीं है, तो यह सारा आयोजन निरर्थक है। ईश्वर स्वयं में पूर्ण हैं और उनको हमसे
कुछ नहीं चाहिए किन्तु यदि हम उन्हें थोड़ा जल, एक फूल तथा एक तुलसीदल भेंट कर दें तो वे इन्हें स्वीकार कर लेंगे। भगवान् को प्रसन्न करने का एकमात्र साधन भक्ति है। बड़े-बड़े यज्ञों के आयोजन की कोई आवश्यकता नहीं होती। पुरोहितों को यह सोच कर विषाद हो रहा था कि वे भक्ति के पथ पर नहीं हैं और ईश्वर उनके यज्ञ से प्रसन्न नहीं हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥