श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 4: भगवान् ऋषभदेव के लक्षण  »  श्लोक 17

 
श्लोक
द्रव्यदेशकालवय:श्रद्धर्त्विग्विविधोद्देशोपचितै: सर्वैरपि क्रतुभिर्यथोपदेशं शतकृत्व इयाज ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
द्रव्य—यज्ञ की साम्रगी; देश—विशिष्ट स्थान, तीर्थ या मन्दिर; काल—उपयुक्त समय, यथा वसन्त; वय:—आयु, विशेषतया युवावस्था; श्रद्धा—अच्छाई में विश्वास; ऋत्विक्—पुरोहितगण; विविध-उद्देश—विभिन्न प्रयोजनों से विभिन्न देवताओं की पूजा करके; उपचितै:—समृद्ध होकर; सर्वै:—सभी प्रकार के; अपि—निश्चय ही; क्रतुभि:—याज्ञिक अनुष्ठानों द्वारा; यथा- उपदेशम्—उपदेश के अनुसार; शत-कृत्व:—एक सौ बार; इयाज—आराधना की ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् ऋषभदेव ने शास्त्रों के अनुसार सभी यज्ञों को सौ सौ बार सम्पन्न किया और इस प्रकार से भगवान् विष्णु को सभी प्रकार से तुष्ट किया। सभी अनुष्ठान उत्तम कोटि की सामग्री से तथा उचित समय में और पवित्र स्थानों पर युवा तथा श्रद्धालु पुरोहितों द्वारा सम्पन्न हुए। इस प्रकार भगवान् विष्णु की पूजा की गई और समस्त देवताओं को प्रसाद वितरित किया गया। सारे अनुष्ठान तथा उत्सव सफल हुए।
 
तात्पर्य
 कहा गया है कि—कौमार आचरेत् प्राज्ञो धर्मान् भागवतानिह (भागवत ७.६.१)। अनुष्ठानों की सफलता के लिए इन्हें युवकों, हो सके तो बालकों द्वारा सम्पन्न कराया जाना चाहिए। मनुष्यों को बचपन से ही वैदिक संस्कृति की और विशेष रूप से भक्तिमय सेवा की, शिक्षा दी जानी चाहिए। इस प्रकार कोई भी अपना जीवन सफल (पूर्ण) बना सकता है। वैष्णव कभी भी देवताओं का अनादर नहीं करता, किन्तु वह इतना मूर्ख नहीं होता कि प्रत्येक देवता को परमेश्वर मान ले। परमेश्वर समस्त देवताओं के स्वामी हैं, अत: सारे देवता उनके सेवक हुए। वैष्णव उन्हें परमेश्वर के दास मानता है और सीधे उन्हीं की उपासना करता है। ब्रह्म-संहिता
में मुख्य देवताओं की उपासना गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि शब्दों द्वारा की जाती है। मुख्य देवताओं में शिव, ब्रह्मा तथा भगवान् कृष्ण के अवतार तथा विस्तार जैसे गर्भोदकशायी विष्णु, महाविष्णु तथा अन्य समस्त विष्णुतत्त्व के साथ ही दुर्गादेवी जैसे शक्तितत्त्व उल्लेखनीय हैं। वैष्णव दैवताओं की उपासना गोविन्द के संदर्भ में करता है, स्वतंत्र रूप से नहीं। वैष्णव इतना मूर्ख नहीं होता कि वह देवताओं को भगवान् से स्वतंत्र माने। इसकी पुष्टि चैतन्यचरितामृत में—एकले ईश्वर कृष्ण, आर सब भृत्य—से हुई है, जिसका अर्थ है—श्रीकृष्ण परमेश्वर हैं और अन्य सभी उनके सेवक हैं।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥