श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 4: भगवान् ऋषभदेव के लक्षण  »  श्लोक 5

 
श्लोक
विदितानुरागमापौरप्रकृति जनपदो राजा नाभिरात्मजं समयसेतुरक्षायामभिषिच्य ब्राह्मणेषूपनिधाय सह मेरुदेव्या विशालायां प्रसन्ननिपुणेन तपसा समाधियोगेन नरनारायणाख्यं भगवन्तं वासुदेवमुपासीन: कालेन तन्महिमानमवाप ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
विदित—भलीभाँति ज्ञात; अनुरागम्—लोकप्रियता; आपौर-प्रकृति—समस्त नागरिकों तथा प्रशासकों के बीच; जन-पद:— सामान्य जनों की सेवा की इच्छा से; राजा—राजा; नाभि:—नाभि; आत्मजम्—अपने पुत्र को; समय-सेतु-रक्षायाम्—धार्मिक जीवन के वैदिक नियमों के अनुसार जनता की रक्षा करते हुए; अभिषिच्य—राज्याभिषेक करके; ब्राह्मणेषु—ब्राह्मणों को; उपनिधाय—सौंप कर; सह—साथ; मेरुदेव्या—अपनी पत्नी मेरुदेवी के साथ. मेरुदेवी; विशालायाम्—बदरिकाश्रम में; प्रसन्न निपुणेन—अत्यन्त संतोष एवं निपुणता के साथ रहते हुए; तपसा—तपस्या से; समाधि-योगेन—पूर्ण समाधि से; नर-नारायण- आख्यम्—नर-नारायण नामक; भगवन्तम्—भगवान्; वासुदेवम्—श्रीकृष्ण को; उपासीन:—उपासना करते हुए; कालेन— कालक्रम से; तत्-महिमानम्—महिमामय धाम, वैकुण्ठ लोक को; अवाप—प्राप्त किया ।.
 
अनुवाद
 
 राजा नाभि ने समझ लिया था कि उनका पुत्र ऋषभदेव नागरिकों, प्रशासकों तथा मंत्रियों में अत्यन्त लोकप्रिय है। अत: उन्होंने वैदिक धर्म-पद्धति अनुसार जनता की रक्षा के उद्देश्य से अपने पुत्र को संसार के सम्राट के रूप में अभिषिक्त कर दिया और उसे विद्वान ब्राह्मणों के हाथों में सौप दिया जो शासन चलाने में उसका मार्ग-दर्शन कर सकें। फिर महाराज नाभि अपनी पत्नी मेरुदेवी के साथ हिमालय पर्वत स्थित बदरिकाश्रम में गये और वहाँ पर अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक एवं निपुणता के साथ तपस्या में लग गये। पूर्ण समाधि में उन्होंने कृष्ण के ही अंश रूप भगवान् नर-नारायण की उपासना की, अत: कालक्रम में महाराज नाभि को वैकुण्ठ प्राप्त हुआ।
 
तात्पर्य
 जब महाराज नाभि ने देखा कि जनता तथा राज्य अधिकारियों के बीच उनका पुत्र ऋषभदेव अत्यन्त लोकप्रिय हो गया है, तो उन्होंने उसे राज्य-सिंहासन पर आसीन करने का निश्चय किया। साथ ही, वे अपने पुत्र को बुद्धिमान ब्राह्मणों के हाथों में सौंपना चाहते थे। इसका तात्पर्य यह हुआ कि राजा को बुद्धिमान ब्राह्मणों की देखरेख में वैदिक नियमों के अनुसार राज्य करना होता था जिससे वे मनुस्मृति तथा इसी प्रकार के वैदिक शास्त्रों के अनुसार सलाह दे सकें। राजा का यह कर्तव्य है कि वह वैदिक नियमों के अनुसार शासन चलाए। वैदिक नियमों के अनुसार समाज चार वर्गों में विभाजित है—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र—चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश:। समाज को इस प्रकार विभाजित करने के बाद यह राजा का कर्तव्य है कि वह यह देखे कि प्रत्येक व्यक्ति अपने वर्ण (जाति) के अनुसार वैदिक नियमों का पालन करे। ब्राह्मण को चाहिए कि वह जनता को ठगे बिना ब्राह्मण का कर्तव्य निभाए। बिना योग्यता के किसी को ब्राह्मण कहलाने का अधिकार नहीं है। यह राजा का कर्तव्य है कि वह देखे कि प्रत्येक व्यक्ति वैदिक नियमानुसार अपना व्यावसायिक कर्तव्य निबाहे। साथ ही, जीवन के अन्त समय में वैराग्य अनिवार्य है। महाराज नाभि, राजा रहते हुए भी, गृहस्थ जीवन से विरक्त हो गये और अपनी पत्नी के साथ हिमालय बदरिकाश्रम चले गये जहाँ नर नारायण विग्रह की उपासना की जाती है। प्रसन्न-निपुणेन तपसा शब्दों से सूचित होता है कि राजा ने अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक तथा पटुता के साथ सभी प्रकार की तपस्याएँ की। सम्राट् होते हुए भी अपने सुविधामय जीवन का परित्याग करने में उन्हें कोई कठिनाई नहीं हुई। बदरिकाश्रम में कठिन तपस्या करते हुए भी वे परम प्रसन्न थे और सारा कार्य दक्षतापूर्वक करते रहे। इस प्रकार कृष्णभावनामृत (समाधि योग) में पूर्ण निमग्न रहकर और सतत वासुदेव कृष्ण का ध्यान करते हुए महाराज नाभि ने जीवन के अन्तिम काल में सफलता प्राप्त की और वैकुण्ठलोक को भेज दिए गये।
यही वैदिक जीवन पद्धति है। मनुष्य को जन्म-मृत्यु के चक्र से छूटकर घर लौटजाना चाहिए अर्थात् वापस चला-जाना चाहिए भगवान् के धाम जाना है। इस प्रसंग में तन्महिमानम् अवाप शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। श्रील श्रीधर स्वामी का कहना है कि महिमा का अर्थ जीवन से मुक्ति है। अत: हमें इस जीवन में ऐसे कर्म करने चाहिए कि इस शरीर को त्यागने के बाद हम जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त हो सकें। यही जीवन्मुक्ति कहलाती है। श्रील वीर राघव आचार्य लिखते हैं कि छान्दोग्य उपनिषद् में जीवन्-मुक्त अर्थात् इस शरीर में ही जो मुक्त को चुका है उसके आठ लक्षण बताए गये हैं। पहला लक्षण है, अपहत पाप—अर्थात् वह समस्त पापकर्मों से मुक्त रहता है। जब तक मनुष्य माया के चंगुल में रहता है, वह पाप-कर्म में लगा रहता है। भगवद्गीता में ऐसे मनुष्यों को दुष्कृतिन: कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वे सदैव पापकर्म में रत रहते हैं। जो जीवन्मुक्त है, वह कभी पाप नहीं करता। व्यभिचार, मद्यपान, मांसाहार तथा द्यूत क्रीड़ा—ये ही पापकर्म हैं। जीवन्मुक्त मनुष्य का दूसरा लक्षण है, विजर—अर्थात् उसे वृद्धावस्था के कष्ट नहीं भोगने पड़ते। तृतीय लक्षण है, विमृत्यु—अर्थात् वह मनुष्य जो अपने आप को इस प्रकार तैयार करता है कि वह आगे और कोईशरीर धारण नहीं करता, क्योंकि इनकी मृत्यु होनी ही है। दूसरे शब्दों में, वह जन्म-मरण के चक्र से छूट जाता है। चतुर्थ लक्षण है, विशोक—अर्थात् वह भौतिक शोक तथा हर्ष के प्रति उदासीन रहता है। पंचम लक्षण, विजिघत्स है, जिसका अर्थ है कि उसे भौतिक सुख की कामना नहीं रहती। षष्ठम लक्षण है, अपिपाता—अर्थात् वह अपने परम प्रिय ईश्वर श्रीकृष्ण की भक्ति के अतिरिक्त और कुछ नहीं करना चाहता। सप्तम लक्षण है, सत्य-काम—जिसका अर्थ है कि उसकी समस्त आकांक्षाएँ परम सत्य श्रीकृष्ण की ओर उन्मुख होती हैं। वह सत्य-संकल्प होता है। उसकी समस्त कामनाओं को पूरा करने वाले श्रीकृष्ण हैं। प्रथम तो भौतिक लाभ के लिए वह कोई इच्छा ही नहीं करता और यदि करता भी है, तो वह ईश्वर की सेवा मात्र करना चाहता है। इसीलिए उसे सत्य-संकल्प कहते हैं। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती इंगित करते हैं कि महिमा का अर्थ वैकुण्ठलोक को—भगवद्धाम को वापस जाना है। श्रील शुकदेव का कथन है कि महिमा का अर्थ है कि भक्त भगवान् के गुणों को प्राप्त कर लेता है। इसे सधर्म अर्थात् सम-गुण कहते हैं। जिस प्रकार कृष्ण न तो जन्मते हैं और न मरते हैं उसी प्रकार उनके जो भक्त भगवान् के धाम पहुँच जाते हैं, वे फिर इस संसार के जन्म-मरण चक्र में नहीं पड़ते।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥