श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 5: भगवान् ऋषभदेव द्वारा अपने पुत्रों को उपदेश  »  श्लोक 1

 
श्लोक
ऋषभ उवाच
नायं देहो देहभाजां नृलोके
कष्टान् कामानर्हते विड्भुजां ये ।
तपो दिव्यं पुत्रका येन सत्त्वं
शुद्ध्येद्यस्माद् ब्रह्मसौख्यं त्वनन्तम् ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
ऋषभ: उवाच—भगवान् ऋषभ ने कहा; न—नहीं; अयम्—यह; देह:—शरीर; देह-भाजाम्—समस्त देहधारियों का; नृ लोके—इस संसार में; कष्टान्—कष्टकारक; कामान्—इन्द्रियतृप्ति, विषय; अर्हते—चाहिए; विट्-भुजाम्—विष्ठा खाने वालों का; ये—जो; तप:—तपस्या; दिव्यम्—दिव्य; पुत्रका:—हे पुत्रो; येन—जिसके द्वारा; सत्त्वम्—हृदय; शुद्ध्येत्—पवित्र होता है; यस्मात्—जिससे; ब्रह्म-सौख्यम्—आध्यात्मिक आनन्द; तु—निश्चय ही; अनन्तम्—अनन्त ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् ऋषभदेव ने अपने पुत्रों से कहा—हे पुत्रो, इस संसार के समस्त देहधारियों में जिसे मनुष्य देह प्राप्त हुई है उसे इन्द्रियतृप्ति के लिए ही दिन-रात कठिन श्रम नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा तो मल खाने वाले कूकर-सूकर भी कर लेते हैं। मनुष्य को चाहिए कि भक्ति का दिव्य पद प्राप्त करने के लिए वह अपने को तपस्या में लगाये। ऐसा करने से उसका हृदय शुद्ध हो जाता है और जब वह इस पद को प्राप्त कर लेता है, तो उसे शाश्वत जीवन का आनन्द मिलता है, जो भौतिक आनंद से परे है और अनवरत चलने वाला है।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में भगवान् ऋषभदेव अपने पुत्रों को मनुष्य जीवन की महत्ता बताते हैं। देह भाक् शब्द से “भौतिक देह धारण करने वाले” का बोध होता है, किन्तु जिस जीवात्मा को मनुष्य देह प्राप्त होती है उसे पशुओं से भिन्न आचरण करना चाहिए। कूकर तथा शूकर मल खाकर इन्द्रियतृप्ति कर लेते हैं। दिन भर अथक परिश्रम करने के बाद मनुष्य रात्रि के समय खा-पीकर संभोग और शयन द्वारा आनंद उठाना चाहते हैं। किन्तु इसके साथ ही उन्हें अपनी रक्षा भी करनी होती है। किन्तु यह कोई मानव सभ्यता नहीं। मनुष्य जीवन का अर्थ है आध्यात्मिक जीवन की उन्नति के लिए स्वेच्छा से कष्ट सहना। निस्सन्देह, पशुओं तथा वृक्षों को भी अपने विगत दुष्कर्मों के कारण कष्ट भोगने पड़ते हैं। किन्तु मनुष्य को दिव्य जीवन की प्राप्ति के लिए तपस्या के रूप में कष्टों को स्वेच्छा से अंगीकार करना चाहिए। दिव्य जीवन प्राप्त करने के अनन्तर उसे शाश्वत आनन्द प्राप्त हो सकता है। मुख्य बात तो यह है कि प्रत्येक जीवात्मा सुखोपभोग चाहता है, किन्तु जब तक वह इस देह में बन्दी है उसे विभिन्न प्रकार के कष्ट झेलने होते हैं। मनुष्य में उच्चतर बुद्धि पायी जाती है। हमें चाहिए कि हम गुरुजनों के उपदेश के अनुसार कार्य करें जिसमें शाश्वत सुख प्राप्त हो और हम भगवान् के धाम लौट सकें।
इस श्लोक में यह बात भी महत्त्वपूर्ण है कि सरकार तथा विधिक संरक्षक पिता को चाहिए कि अपने अधीनस्थों को शिक्षित करके कृष्णभावनामृत तक पहुँचाएँ। कृष्णभावनामृत के बिना प्रत्येक जीव जन्म तथा मृत्यु के चक्कर में सदा के लिए फँसा रहता है। इस बन्धन से छुड़ाने के लिए तथा उन्हें प्रसन्न तथा आनन्दित बनाने के लिए भक्तियोग की शिक्षा दी जानी चाहिए। विमूढ सभ्यता ही अपने नागरिकों को भक्तियोग तक पहुँचाने वाली शिक्षा से वंचित रखती है। कृष्णभक्ति के बिना मनुष्य कूकर-सूकर तुल्य है। ऋषभदेव के उपदेश वर्तमान समय में अत्यन्त अनिवार्य हैं। मनुष्यों को इन्द्रियतृप्ति के लिए घोर श्रम करने की शिक्षा दी जाती है और जीवन में उनका कोई महदुद्देश्य नहीं रहता। मनुष्य जीविकोपार्जन के लिए भोर होते ही अपने घर से निकलता है और ठसाठस भरी हुई लोकल रेलगाड़ी पकड़ता है। उसे अपने कार्यालय तक पहुँचने में एक या दो घंटे तक खड़े रहना पड़ता है। फिर वह बस पकडक़े अपने कार्यालय पहुँचता है, कार्यालय में नौ से पाँच बजे तक मेहनत से काम करता है और घर लौटने में उसे फिर से दो-तीन घंटे लग जाते हैं। भोजनोपरान्त संभोग करके निद्रा में लीन हो जाता है। इन समस्त कष्टों का एकमात्र लाभ थोड़ा सा मैथुन-सुख है। यन् मैथुनादि-गृहमेधि सुखं हि तुच्छम्। ऋषभदेव स्पष्ट कहते हैं कि मनुष्य जीवन इस प्रकार जीने के लिए नहीं मिला, क्योंकि ऐसा भोग तो कूकर-सूकर भी करते हैं। दरअसल, कूकर-सूकर को मैथुन के लिए इतना श्रम भी नहीं करना पड़ता। मनुष्य को चाहिए कि वह कूकर-शूकर का अनुकरण न करके भिन्न प्रकार का जीवन जिए। अत: वहाँ इसके विकल्प का उल्लेख किया गया है। मनुष्य जीवन तपस्या के लिए है। तपस्या के द्वारा वह भव-बन्धन से छूट सकता है। कृष्णभावनामृत में रहकर मनुष्य को शाश्वत सुख की गारंटी मिल जाती है। भक्तियोग के द्वारा यह जीवन निर्मल हो जाता है। जन्म-जन्मांतर तक जीवात्मा सुख की खोज करता है, किन्तु इस अकेले भक्तियोग से वह अपनी सभी समस्याओं का हल पा सकता है। फिर वह अविलम्ब भगवद्धाम जाने का भागी हो जाता है। इसकी पुष्टि भगवद्गीता (४.९) में की गई है—

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वत:।

त्यक्त्या देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥

“हे अर्जुन! मेरे जन्म तथा कर्म दिव्य हैं, जो मनुष्य यह जान लेता है, वह देह को त्याग कर संसार में फिर जन्म नहीं लेता वरन् मेरे सनातन धाम को प्राप्त होता है।”

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥