श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 5: भगवान् ऋषभदेव द्वारा अपने पुत्रों को उपदेश  »  श्लोक 19

 
श्लोक
इदं शरीरं मम दुर्विभाव्यं
सत्त्वं हि मे हृदयं यत्र धर्म: ।
पृष्ठे कृतो मे यदधर्म आराद्
अतो हि मामृषभं प्राहुरार्या: ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
इदम्—यह; शरीरम्—दिव्य देह अथवा सच्चिदानन्द विग्रह; मम—मेरा; दुर्विभाव्यम्—अकल्पनीय; सत्त्वम्—भौतिक गुणरहित; हि—निस्संदेह; मे—मेरा; हृदयम्—हृदय; यत्र—जहाँ पर; धर्म:—धर्म का वास्तविक पद अथवा भक्तियोग; पृष्ठे— पीठ पर; कृत:—बनाया हुआ; मे—मेरे द्वारा; यत्—क्योंकि; अधर्म:—अधर्म; आरात्—अत्यन्त दूर; अत:—इसलिए; हि— निस्संदेह; माम्—मुझको; ऋषभम्—जीवों में श्रेष्ठ; प्राहु:—पुकारते हैं; आर्या:—श्रेष्ठ जन, सत्पुरुष ।.
 
अनुवाद
 
 मेरा दिव्य शरीर (सच्चिदाननन्द विग्रह) मानव सदृश दिखता है, किन्तु यह भौतिक मनुष्य शरीर नहीं है। यह अकल्पनीय है। मुझे प्रकृति द्वारा बाध्य होकर किसी विशेष प्रकार का शरीर नहीं धारण करना पड़ता, मैं अपनी इच्छानुकूल शरीर धारण करता हूँ। मेरा हृदय भी दिव्य है और मैं सदैव अपने भक्तों का कल्याण चाहता रहता हूँ। इसलिए मेरे हृदय में भक्ति पूरित है, जो भक्तों के लिए है। मैंने अधर्म को हृदय से बहुत दूर भगा दिया है। मुझे अभक्ति के कार्य बिल्कुल अच्छे नहीं लगते। इन दिव्य गुणों के कारण सामान्य रूप से लोग मेरी उपासना भगवान् ऋषभदेव के रूप में करते हैं, जो भी जीवात्माओं में श्रेष्ठ है।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में इदं शरीरं मम दुर्विभाव्यम् शब्द उल्लेखनीय हैं। सामान्य रूप से हम दो प्रकार की शक्तियों का अनुभव करते हैं—भौतिक शक्ति (माया) तथा आध्यात्मिक शक्ति। हमें भौतिक शक्ति (पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश, मन, बुद्धि, अहं) का कुछ-कुछ अनुभव है, क्योंकि भौतिक जगत में सबों का शरीर इन्हीं तत्त्वों से बना होता है। भौतिक शरीर के भीतर आत्मा होती है, किन्तु उसे हम भौतिक आँखों से नहीं देख सकते। जब हम आध्यात्मिक शक्ति से पूर्ण शरीर देखते हैं, तो हमारे लिए यह समझ पाना कठिन हो जाता है कि आध्यात्मिक शक्ति को शरीर कैसे प्राप्त हो सकता है। कहा जाता है कि ऋषभदेव का शरीर पूर्णतया दिव्य है, अत: संसारी पुरुष के लिए उसको समझ पाना कठिन है। उसके लिए पूर्णतया आध्यात्मिक शरीर अकल्पनीय है। जब हमें व्यावहारिक बुद्धि से कोई विषय समझ में नहीं आता तो हमें वेदों की दृष्टि ग्रहण करनी चाहिए। जैसाकि ब्रह्म संहिता में कहा गया है—ईश्वर: परम: कृष्ण: सच्चिदानन्दविग्रह:। परमेश्वर का शरीर स्वरूप युक्त होता है, किन्तु यह भौतिक तत्त्वों का बना हुआ नहीं रहता। यह आध्यात्मिक आनन्द, शाश्वतता तथा चेतना से बना होता है। भगवान् की अकल्पनीय शक्ति से ईश्वर अपने आदि-दिव्य शरीर में प्रकट हो सकता है, किन्तु ऐसे शरीर का कोई अनुभव न होने से हम कभी कभी मोहग्रस्त हो जाते हैं और ईश्वर के रूप को भौतिक समझ बैठते हैं। मायावादी दार्शनिक ईश्वर की दिव्य देह की कल्पना करने में सर्वथा अक्षम हैं। उनका कथन है कि आत्मा सदैव निराकार है, अत: जब भी वे किसी साकार वस्तु को देखते हैं, तो उसे भौतिक मान बैठते हैं। भगवद्गीता (९.११) में कहा गया है—
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्।

परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥

“जब मैं मनुष्य रूप में अवतरित होता हूँ तो मूर्ख मेरा उपहास करते हैं। वे मुझ परमेश्वर के दिव्य स्वभाव तथा मेरे परम साम्राज्य को नहीं जानते।”

अज्ञानी लोग सोचते हैं कि परमेश्वर भौतिक शक्ति से बने शरीर को धारण करते हैं। भौतिक शरीर सरलता से हमारी समझ में आ जाता है, किन्तु आध्यात्मिक शरीर नहीं। अत: ऋषभदेव कहते हैं—इदं शरीरं मम दुर्विभाव्यम्—वैकुण्ठ जगत में प्रत्येक का शरीर आध्यात्मिक होता है। यहाँ भौतिक अस्तित्व की कोई संकल्पना नहीं है। वैकुण्ठ जगत में केवल सेवा है और सेवा की प्राप्ति। यहाँ सेव्य, सेवा तथा सेवक ये तीन ही हैं। ये तीनों पूर्णतया आध्यात्मिक हैं अत: वैकुण्ठ जगत परम है। इसमें भौतिक कलुष छू तक नहीं गया। भौतिक संकल्पना से नितान्त परे होने से भगवान् ऋषभदेव कहते हैं कि उनका हृदय धर्म से बना है। भगवद्गीता (१८.६६) में धर्म की व्याख्या इस प्रकार की गई है—

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। वैकुण्ठ जगत में प्रत्येक जीवात्मा परमेश्वर को समर्पित है और पूर्णतया आध्यात्मिक पद पर आसीन है। यद्यपि सेवक, सेव्य तथा सेवा सभी हैं, किन्तु सभी आध्यात्मिक हैं और चित्र-विचित्र। इस समय हमारी भौतिक कल्पना के कारण प्रत्येक वस्तु अकल्पनीय—दुर्विभाव्य—है। सर्वश्रेष्ठ होने के कारण ईश्वर ऋषभदेव कहलाते हैं। वैदिक पदावली में कहना चाहें तो कहेंगे—नित्यो नित्यानाम्। हम भी आध्यात्मिक हैं, किन्तु आश्रित हैं। अत: श्रीकृष्ण, जो परमेश्वर हैं आदि व्यक्ति हैं। ऋषभ शब्द का अर्थ है प्रमुख अथवा सर्वश्रेष्ठ और यह परम पुरुष या साक्षात् ईश्वर का सूचक है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥