श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 5: भगवान् ऋषभदेव द्वारा अपने पुत्रों को उपदेश  »  श्लोक 2

 
श्लोक
महत्सेवां द्वारमाहुर्विमुक्ते-
स्तमोद्वारं योषितां सङ्गिसङ्गम् ।
महान्तस्ते समचित्ता: प्रशान्ता
विमन्यव: सुहृद: साधवो ये ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
महत्-सेवाम्—आध्यात्मिक रूप से उन्नत व्यक्ति जिन्हें महात्मा कहा जाता है, उन की सेवा; द्वारम्—मार्ग; आहु:—कहते हैं; विमुक्ते:—मुक्ति का; तम:-द्वारम्—नारकीय अंधकारमय जीवन का मार्ग; योषिताम्—स्त्रियों की; सङ्गि—साथियों की; सङ्गम्—संगति, साथ; महान्त:—महात्मा; ते—वे; सम-चित्ता:—सब प्राणियों को समभाव से देखने वाले; प्रशान्ता:—अत्यन्त शान्त, ब्रह्म या भगवान् में लीन; विमन्यव:—क्रोधहीन; सुहृद:—प्रत्येक प्राणी के शुभचिन्तक; साधव:—अनिंद्य आचरण वाले योग्य भक्त; ये—जो ।.
 
अनुवाद
 
 आध्यात्मिक दृष्टि से उन्नत महापुरुषों की सेवा करके ही मनुष्य भव-बन्धन से मुक्ति का मार्ग प्राप्त कर सकता है। ये महापुरुष निर्विशेषवादी तथा भक्त होते हैं। ईश्वर से तदाकार होने अथवा भगवान् का संग प्राप्त करने के इच्छुक प्रत्येक मनुष्य को महात्माओं की सेवा करनी चाहिए। ऐसे कर्मों में रुचि न रखने वाले लोग, जो स्त्री तथा मैथुन प्रेमी व्यक्तियों की संगति करते हैं उनके लिए नरक का द्वार खुला रहता है। महात्मा समभाव वाले होते हैं। वे एक जीवात्मा तथा दूसरे में कोई अन्तर नहीं देखते। वे अत्यन्त शान्त होते हैं और भक्ति में पूर्णतया लीन रहते हैं। वे क्रोधरहित होते हैं और सभी के कल्याण के लिए कार्य करते हैं। वे कोई निंद्य आचरण नहीं करते। ऐसे व्यक्ति महात्मा कहलाते हैं।
 
तात्पर्य
 मानव शरीर चौराहे के समान है। चाहे तो कोई मुक्ति का मार्ग ग्रहण करे या नरक जाने वाले मार्ग का अनुसरण करे। यहाँ यह बताया गया है कि कोई किस प्रकार इस मार्गों को ग्रहण करे। मुक्तिमार्ग में महात्माओं की संगति मिलती है तथा बन्धनमार्ग में इन्द्रियतृप्ति तथा कामासक्त व्यक्तियों का संग प्राप्त होता है। महात्मा दो प्रकार के होते हैं—निर्विशेषवादी तथा भक्त। यद्यपि उनका परम लक्ष्य भिन्न-भिन्न रहता है, किन्तु उद्धार की विधि एक सी है। दोनों ही शाश्वत सुख ही कामना करते हैं। एक निराकार ब्रह्म में सुख खोजता है और दूसरा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की संगति में रहकर। प्रथम श्लोक में ब्रह्म-सौख्यम् शब्द आया है। ब्रह्म का अर्थ शाश्वत है। निर्विशेषवादी तथा भक्त दोनों ही जीवन के शाश्वत आनन्द की खोज करते हैं। प्रत्येक दशा में पूर्ण बनने का उपदेश है। चैतन्यचरितामृत (मध्य २२.८७) के शब्दों में—
असत्-संग-त्याग,—एइ वैष्णव-आचार।

स्त्री-संगी’—एक असाधु, ‘कृष्णाभक्त’ आर।

प्रकृति के गुणों से विरक्त रहने के लिए असत् अर्थात् भौतिकतावादी लोगों की संगति से बचना चाहिए। दो प्रकार के भौतिकतावादी (असत्) हैं—एक तो स्त्री तथा इन्द्रियतृप्ति में आसक्त हैं, दूसरे मात्र अभक्त हैं। सही दिशा है महात्माओं की संगति और उल्टी दिशा है अभक्तों तथा कामियों (स्त्रीसंगियों) से दूर रहना।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥