श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 5: भगवान् ऋषभदेव द्वारा अपने पुत्रों को उपदेश  »  श्लोक 20

 
श्लोक
तस्माद्भवन्तो हृदयेन जाता:
सर्वे महीयांसममुं सनाभम् ।
अक्लिष्टबुद्ध्या भरतं भजध्वं
शुश्रूषणं तद्भरणं प्रजानाम् ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
तस्मात्—अत: (क्योंकि मैं ही सर्वश्रेष्ठ हूँ); भवन्त:—तुम लोग; हृदयेन—मेरे हृदय से; जाता:—उत्पन्न; सर्वे—सभी; महीयांसम्—सर्वश्रेष्ठ; अमुम्—वह; स-नाभम्—भ्राता; अक्लिष्ट-बुद्ध्या—भौतिक कलुषहीन आपकी बुद्धि से; भरतम्—भरत की; भजध्वम्—सेवा करने का यत्न मात्र करो; शुश्रूषणम्—सेवा; तत्—वह; भरणम् प्रजानाम्—नागरिकों (प्रजा) पर शासन ।.
 
अनुवाद
 
 मेरे प्रिय पुत्रो, तुम सभी मेरे हृदय से उत्पन्न हो जो समस्त दिव्य गुणों का केन्द्र है। अत: तुम्हें संसारी तथा ईर्ष्यालु मनुष्यों के समान नहीं होना है। तुम अपने सबसे बड़े भाई भरत को मानो, क्योंकि वह भक्ति में श्रेष्ठ है। यदि तुम लोग भरत की सेवा करोगे तो उसकी सेवा में मेरी सेवा सम्मिलित होगी और तुम स्वयमेव प्रजा पर शासन करोगे।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में हृदय शब्द हृदय के अतिरिक्त उर: अर्थात् वक्षस्थल का भी सूचक है। हृदय वक्ष:स्थल में स्थित है। यद्यपि पुत्र तांत्रिक रूप से जननांग से उत्पन्न होता है, किन्तु वास्तव में वह हृदय से ही उत्पन्न माना जाता है। हृदय की स्थिति के अनुसार ही वीर्य शरीर का रूप धारण करता है।
अत: जब किसी के पुत्र उत्पन्न होता है, तो वैदिक प्रथा के अनुसार उसके हृदय को गर्भाधान संस्कार द्वारा शुद्ध किया जाना चाहिए। ऋषभदेव का हृदय सदा निष्कलुष एवं आध्यात्मिक था, अत: उनके हृदय से उत्पन्न सभी पुत्र आध्यात्मिक प्रवृत्ति के थे। फिर भी ऋषभदेव ने सुझाया कि उनका सबसे ज्येष्ठ पुत्र प्रवर है इसलिए अन्यों को उसकी सेवा करनी चाहिए। भरत महाराज के सभी भाइयों को ऋषभदेव द्वारा भरत की सेवा में संलग्न रहने की सलाह दी गई। यहाँ यह प्रश्न पूछा जा सकता है कि मनुष्य को परिवार के सदस्यों में क्यों आसक्त होना चाहिए जबकि प्रारम्भ में उपदेश दिया गया है कि मनुष्य को घर तथा परिवार में लिप्त नहीं होना चाहिए? किन्तु साथ ही यह भी उपदेश है—महीयसां पादरजोऽभिषेक—मनुष्य को महीयान अर्थात् दिव्य दृष्टि से महान् की सेवा करनी चाहिए। महत् सेवां द्वारम् आहुर्विमुक्ते:—महत् अर्थात् महान् भक्त की सेवा करने से मुक्ति का द्वार खुल जाता है। ऋषभदेव का परिवार कोई सामान्य परिवार न था। ऋषभदेव का ज्येष्ठ पुत्र भरत विशेष रूप से महान् था। इसीलिए अन्य पुत्रों को उनकी सेवा करने का उपदेश दिया गया। यही उनका कर्तव्य था।

परमेश्वर महाराज भरत को इस लोक का प्रमुख शासक बनाने का उपदेश दे रहे थे। यही परमेश्वर की असली योजना थी। कुरुक्षेत्र के युद्ध में श्रीकृष्ण महाराज युधिष्ठिर को इस लोक का चक्रवर्ती राजा बनाना चाहते थे। वे कभी नहीं चाहते थे कि यह पद दुर्योधन को मिले। जैसाकि पिछले श्लोक में कहा जा चुका है कि भगवान् ऋषभदेव का हृदय हृदयं यत्र धर्म: था। भगवद्गीता में धर्म का लक्षण बताया गया है—भगवान् को समर्पण करो। धर्म की रक्षा हेतु (परित्राणाय साधूनाम् ) ईश्वर सदा अपने भक्त को पृथ्वी का शासक बनाना चाहते हैं। तभी सबों का कल्याण सम्भव है। ज्योंही असुर पृथ्वी का शासन सँभालता है अव्यवस्था फैल जाती है। इस समय यह जगत प्रजातांत्रिक प्रणाली के प्रति उन्मुख है, किन्तु सामान्य लोग रजो तथा तमो गुणों से कलुषित हैं। फलत: वे शासन चलाने के लिए उचित व्यक्ति नहीं चुन सकते। राष्ट्रपति का चुनाव मूर्ख शूद्रों के मतदान से होता है, अत: एक और शूद्र चुन लिया जाता है और फिर सारी सरकार दूषित हो जाती है। यदि जनता भगवद्गीता के नियमों का कठोरता से पालन करे तो सदैव ईश्वर का भक्त ही चुना जाएगा। फिर तो स्वत: उत्तम शासन होगा। इसलिए ऋषभदेव ने महाराज भरत को इस लोक का सम्राट बनाए जाने को कहा। भक्त की सेवा का अर्थ है परमेश्वर की सेवा, क्योंकि भक्त सदा ईश्वर का प्रतिनिधि होता है। जब भक्त यह भार लेता है, तो सरकार सदैव मैत्रीपूर्ण तथा सर्व कल्याणमय होती है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥