श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 5: भगवान् ऋषभदेव द्वारा अपने पुत्रों को उपदेश  »  श्लोक 26

 
श्लोक
सर्वाणि मद्धिष्ण्यतया भवद्भ‍ि-
श्चराणि भूतानि सुता ध्रुवाणि ।
सम्भावितव्यानि पदे पदे वो
विविक्तद‍ृग्भिस्तदु हार्हणं मे ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
सर्वाणि—समस्त; मत्-धिष्ण्यतया—मेरा आसन होने के कारण; भवद्भि:—तुम्हारे द्वारा; चराणि—चर; भूतानि—जीवात्माएँ; सुता:—हे पुत्रो; ध्रुवाणि—अचर; सम्भावितव्यानि—आदरणीय; पदे पदे—पग पग पर, प्रतिक्षण; व:—तुम लोगों के द्वारा; विविक्त-दृग्भि:—स्पष्ट दृष्टि तथा ज्ञान से युक्त (परमात्मा रूप में भगवान् सर्वव्यापी हैं); तत् उ—अप्रत्यक्षत: जो; ह—निश्चय ही; अर्हणम्—आदर देते हुए; मे—मुझे ।.
 
अनुवाद
 
 हे पुत्रो, तुम्हें चराचर किसी जीवात्मा से ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए। यह जानते हुए कि मैं उनमें स्थित हूँ, प्रत्येक क्षण उनका समादर करना चाहिए। इस प्रकार तुम मेरा आदर करो।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में विविक्त-दृग्भि: अर्थात् ईर्ष्यारहित शब्द का प्रयोग हुआ है। सभी जीवात्माओं में भगवान् का वास परमात्मा रूप में होता है। जैसाकि ब्रह्म-संहिता में पुष्टि की गई है— अण्डान्तरस्थं परमाणुचयान्तरस्थम्। इस ब्रह्माण्ड में भगवान् गर्भोदकशायी विष्णु तथा क्षीरोदकशायी विष्णु के रूप में स्थित हैं। वे प्रत्येक परमाणु में व्याप्त हैं। वेदों का कथन है—ईशावास्यमिदं सर्वम्। परमेश्वर सर्वत्र स्थित हैं और जहाँ कहीं भी वे स्थित हैं वह उनका मन्दिर है। हम दूर से भी मन्दिर को प्रणाम करते हैं। इसी प्रकार से समस्त जीवों को प्रणाम किया जाना चाहिए। यह उस विश्वदेवतावाद के सिद्धान्त से भिन्न है, जो प्रत्येक वस्तु को ईश्वर मानता है। ईश्वर से प्रत्येक वस्तु का सम्बन्ध है क्योंकि वे सर्वव्यापक हैं। हमें दरिद्र-नारायण के मूर्ख उपासकों की भाँति ऊँच-नीच में भेदभाव नहीं बरतना चाहिए। नारायण तो धनी तथा निर्धन दोनों में विद्यमान हैं। किसी को यह नहीं समझना चाहिए कि नारायण केवल दरिद्रों (निर्धनों) में वास करते हैं। वे सर्वत्र हैं। परम भक्त प्रत्येक प्राणी को, चाहे वह कुत्ता या बिल्ली ही क्यों न हो, सम्मान प्रदान करता है। भगवद्गीता (५.१८) में कथन है—
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।

शुनि चैव श्वपाके च पंडिता: समदर्शिन: ॥

“यथार्थ से विनीत साधु विद्या तथा विनय युक्त ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ता और चाण्डाल (कुत्ता भक्षक) को समान दृष्टि से देखता है।” इस सम-दर्शिन: शब्द से यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि जीव तथा ईश्वर एक समान हैं। वे सदैव पृथक्-पृथक् हैं। प्रत्येक मनुष्य परमेश्वर से भिन्न है। अत: विविक्त दृक्, सम-दृक् के आधार पर दोनों को एक समान समझना भूल होगी। भगवान् भले ही सर्वत्र रहना स्वीकार करें, किन्तु उनका पद बड़ा है। श्रील मध्वाचार्य पद्म-पुराण से उद्धरण देते हुए कहते हैं— विविक्त-दृष्टि-जीवानां धिष्ण्यतया परमेश्वरस्य भेद-दृष्टि:—“जिसकी दृष्टि विमल है और जो ईष्यारहित है उसे ईश्वर प्रत्येक जीवात्मा में स्थित रह कर भी समस्त जीवात्माओं से पृथक् दिखता है।” वे पद्म पुराण से और आगे भी से उद्धरण देते हैं—

उपपादयेत परात्मानं जीवेभ्यो य: पदे पदे।

भेदेनैव न चैतस्मात् प्रियो विष्णोस्तु कश्चन ॥

“जो जीवात्मा तथा परमेश्वर को पृथक्-पृथक् देखता है, वह उसे परम प्रिय होता है।” पद्मपुराण में ही कहा गया है—यो हरेश्चैव जीवानां भेदवक्ता हरे: प्रिय:—“जो यह उपदेश देता है कि जीवात्मा परमेश्वर से पृथक् है, वह भगवान् विष्णु को परम प्रिय होता है।”

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥