श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 5: भगवान् ऋषभदेव द्वारा अपने पुत्रों को उपदेश  »  श्लोक 27

 
श्लोक
मनोवचोद‍ृक्करणेहितस्य
साक्षात्कृतं मे परिबर्हणं हि ।
विना पुमान् येन महाविमोहात्
कृतान्तपाशान्न विमोक्तुमीशेत् ॥ २७ ॥
 
शब्दार्थ
मन:—मन; वच:—शब्द; दृक्—दृष्टि; करण—इन्द्रियों का; ईहितस्य—समस्त कर्मों (शरीर, समाज, मैत्री इत्यादि बनाये रखने के लिए) का; साक्षात्-कृतम्—प्रत्यक्षत: प्रदत्त; मे—मुझको; परिबर्हणम्—पूजा; हि—क्योंकि; विना—बिना; पुमान्—कोई व्यक्ति; येन—जो; महा-विमोहात्—परम मोह से; कृतान्त-पाशात्—यमराज के पाश से; न—नहीं; विमोक्तुम्—मुक्त होने के लिए; ईशेत्—समर्थ होता है ।.
 
अनुवाद
 
 मन, दृष्टि, वचन तथा समस्त ज्ञानेन्द्रिय तथा कर्मेन्द्रिय इन्द्रियों का वास्तविक कार्य मेरी सेवा में लगे रहना है। जब तक जीवात्मा की इन्द्रियाँ इस प्रकार सेवारत नहीं रहतीं, तब तक जीवात्मा को यमराज के पाश सदृश सांसारिक बन्धन से निकल पाना दुष्कर है।
 
तात्पर्य
 नारद-पंचरात्र में कहा गया है—
सर्वोपाधिदविनिर्मुक्तं तत्परत्वेन निर्मलम्।

हृषीकेण हृषीकेशसेवनं भक्तिरुच्यते ॥

भक्ति का यही सार है। भगवान् ऋषभदेव लगातार भक्ति पर बल दे रहे थे और अब अन्त में यह कहते हैं कि इन्द्रियों को ईश्वर की सेवा में प्रवृत्त करना चाहिए। पाँच इन्द्रियों से हम ज्ञान अर्जित करते हैं और इतनी ही इन्द्रियों से कार्य करते हैं। ये दस इन्द्रियों तथा मन को पूर्णतया भगवान् की सेवा में लगाना चाहिए। ऐसा किये बिना माया के चंगुल से छुटकारा नहीं हो सकता।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥