श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 5: भगवान् ऋषभदेव द्वारा अपने पुत्रों को उपदेश  »  श्लोक 3

 
श्लोक
ये वा मयीशे कृतसौहृदार्था
जनेषु देहम्भरवार्तिकेषु॒ ।
गृहेषु जायात्मजरातिमत्सु
न प्रीतियुक्ता यावदर्थाश्च लोके ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
ये—जो; वा—अथवा; मयि—मुझ; ईशे—भगवान् में; कृत-सौहृद-अर्था:—प्रेम बढ़ाने के लिए उत्सुक (दास्य, सख्य, वात्सल्य या माधुर्य भाव में); जनेषु—व्यक्तियों में; देहम्भर-वार्तिकेषु—जो शरीर का केवल निर्वाह करना चाहते हैं, जिन्हें मोक्ष की कामना नहीं है; गृहेषु—घर में; जाया—पत्नी; आत्म-ज—बच्चे, सन्तान; राति—धन या मित्र; मत्सु—से युक्त; न—नहीं; प्रीति-युक्ता:—अत्यन्त आसक्त; यावत्-अर्था:—जितना आवश्यक है उतना ही धन संग्रह करके रहने वाले; च—तथा; लोके— इस भौतिक जगत में ।.
 
अनुवाद
 
 जो लोग कृष्णचेतना को पुनरुज्जीवित करने तथा अपना ईश्वर-प्रेम बढ़ाने के इच्छुक हैं, वे ऐसा कुछ नहीं करना चाहते जो श्रीकृष्ण से सम्बन्धित न हो। वे उन लोगों से मेलजोल नहीं बढ़ाते जो अपने शरीर-पालन, भोजन, शयन, मैथुन तथा स्वरक्षा में व्यस्त रहते हैं। वे गृहस्थ होते हुए भी अपने घरबार के प्रति आसक्त नहीं होते। वे पत्नी, सन्तान, मित्र अथवा धन में भी आसक्त नहीं होते, किन्तु उसके साथ ही वे अपने कर्तव्यों के प्रति अन्यमनस्क नहीं रहते। ऐसे पुरुष अपने जीवन-निर्वाह के लिए जितना धन चाहिए उतना ही संग्रह करते हैं।
 
तात्पर्य
 चाहे निर्विशेषवादी हो या भक्त, यदि वह वास्तव में आत्मतत्त्व में उन्नति करने में रुचि रखता है, तो उसे चाहिए कि उन लोगों से मेल-जोल न रखे जो तथाकथित सभ्यता के विकास द्वारा अपने शरीर-पालन में ही रुचि दिखाते हैं। न ही उसे पत्नी, सन्तान, मित्र इत्यादि के संग गृहस्थ-सुख भोगने के लिए लालायित रहना चाहिए। यदि कोई गृहस्थ हो और उसे जीविकोपार्जन करना हो, तो निर्वाह के लिए जितने धन की आवश्यकता हो उतना ही संग्रह करना चाहिए। न तो इससे अधिक और न इससे कम। जैसाकि इस
श्लोक में बताया गया है गृहस्थ को चाहिए कि भक्तियोग—श्रवणं कीर्तनं विष्णो: स्मरणं पादसेवनम्। अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यं आत्मनिवेदनम्—पालन के लिए धन कमाने का यत्न करे। गृहस्थ को चाहिए वह ऐसा जीवन बिताए जिससे कि श्रवण तथा कीर्तन के लिए पूरा-पूरा अवसर मिल सके। उसे चाहिए कि घर पर अर्चाविग्रह की पूजा करे, त्यौहार मनाए, मित्रों को आमंत्रित करे और उन्हें प्रसाद दे। गृहस्थ को इन्हीं कार्यों के लिए धन अर्जित करना चाहिए, इन्द्रियतृप्ति के लिए नहीं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥