श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 5: भगवान् ऋषभदेव द्वारा अपने पुत्रों को उपदेश  »  श्लोक 7

 
श्लोक
यदा न पश्यत्ययथा गुणेहां
स्वार्थे प्रमत्त: सहसा विपश्चित् ।
गतस्मृतिर्विन्दति तत्र तापा-
नासाद्य मैथुन्यमगारमज्ञ: ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
यदा—जब; न—नहीं; पश्यति—देखता है; अयथा—अनावश्यक; गुण-ईहाम्—इन्द्रियतुष्टि की चेष्टा; स्व-अर्थे—आत्म-हित में; प्रमत्त:—पागल; सहसा—शीघ्र ही; विपश्चित्—ज्ञानी भी; गत-स्मृति:—स्मृति खोकर; विन्दति—पाता है; तत्र—वहाँ; तापान्—क्लेश; आसाद्य—पाकर; मैथुन्यम्—मैथुन आश्रित; अगारम्—घर; अज्ञ:—अज्ञानवश ।.
 
अनुवाद
 
 भले कोई कितना ही विद्वान तथा चतुर क्यों न हो, यदि वह यह नहीं समझ पाता कि इन्द्रियतृप्ति के लिए की जाने वाली चेष्टाएँ व्यर्थ ही समय की बरबादी है, तो वह पागल है। वह आत्म-हित को भूलकर इस संसार में विषयवासना-प्रधान तथा समस्त भौतिक क्लेशों के आगार अपने घर में आसक्त रहकर प्रसन्न रहना चाहता है। इस प्रकार मनुष्य मूर्ख पशु के ही तुल्य होता है।
 
तात्पर्य
 भक्ति की निम्नतम (अधम) अवस्था में मनुष्य शुद्ध भक्त नहीं होता। अन्याभिलाषिता शून्यं ज्ञान-कर्माद्यनावृतम्—शुद्ध भक्त होने के लिए मनुष्य को समस्त भौतिक कामनाओं से मुक्त होना चाहिए तथा उसे कर्म एवं शुष्क ज्ञान छूना तक नहीं चाहिए। निम्न अवस्था में कभी-कभी दार्शनिक चिन्तन में रुचि हो सकती है, जिस पर भक्ति का रंग चढ़ा हो। किन्तु इस अवस्था में भी मनुष्य इन्द्रियतृप्ति चाहता
है और प्रकृति के गुणों से दूषित रहता है। माया का इतना जबरदस्त प्रभाव रहता है कि ज्ञानी पुरुष भी वास्तव में यह भूल जाता है कि वह श्रीकृष्ण का चिरन्तन दास है। इसलिए वह विषयभोग के चारों ओर केन्द्रित गृहस्थ जीवन में ही आसक्त सन्तुष्ट रहता है। वह विषयी जीवन के समक्ष नत होकर समस्त प्रकार के भौतिक क्लेशों को सहन करता है। अज्ञानवश वह इस प्रकार भौतिक नियमों की साँकल से बँध जाता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥