श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 5: भगवान् ऋषभदेव द्वारा अपने पुत्रों को उपदेश  »  श्लोक 8

 
श्लोक
पुंस: स्त्रिया मिथुनीभावमेतं
तयोर्मिथो हृदयग्रन्थिमाहु: ।
अतो गृहक्षेत्रसुताप्तवित्तै-
र्जनस्य मोहोऽयमहं ममेति ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
पुंस:—पुरुष (नर) का; स्त्रिया:—स्त्री का; मिथुनी-भावम्—कामभोग वासनापूर्ण-जीवन के लिए आकर्षण; एतम्—यह; तयो:—उन दोनों का; मिथ:—परस्पर; हृदय-ग्रन्थिम्—हृदयों की गाँठ; आहु:—कहते हैं; अत:—तत्पश्चात्; गृह—घर; क्षेत्र— खेत; सुत—पुत्र; आप्त—सम्बन्धी, स्वजन; वित्तै:—(तथा) धन से; जनस्य—जीवात्मा का; मोह:—मोह; अयम्—यह; अहम्—मैं; मम—मेरा; इति—इस प्रकार ।.
 
अनुवाद
 
 स्त्री तथा पुरुष के मध्य का आकर्षण भौतिक अस्तित्व का मूल नियम है। इस भ्रांत धारणा के कारण स्त्री तथा पुरुष के हृदय परस्पर जुड़े रहते हैं। इसी के फलस्वरूप मनुष्य अपने शरीर, घर, सन्तान, स्वजन तथा धन के प्रति आकृष्ट होता है। इस प्रकार वह जीवन के मोहों को बढ़ाता है और “मैं तथा मेरा” के रूप में सोचता है।
 
तात्पर्य
 स्त्री तथा पुरुष के बीच सहज आकर्षण का प्रमुख कारण विषयभोग है और विवाहित होने पर यह आकर्षण और भी दृढ़ हो जाता है। स्त्री तथा पुरुष के इस ग्रंथिल सम्बन्ध के कारण मोह उत्पन्न होता है, जिससे यह सोचना पड़ता है कि, “अमुक पुरुष मेरा पति है” या “अमुक स्त्री मेरी पत्नी है।” यह हृदय ग्रंथि कहलाती है। इस ग्रंथि को खोल पाना कठिन है भले ही स्त्री तथा पुरुष वर्णाश्रम के नियमों के अनुसार या तलाक देने के कारण विलग क्यों न हो लें। प्रत्येक दशा में स्त्री पुरुष के बारे में और पुरुष स्त्री के बारे में सोचता रहता है। इस प्रकार व्यक्ति परिवार, धन तथा सन्तान के प्रति भौतिक रूप से आसक्त हो जाता है, भले ही ये सब क्षणिक क्यों न हों। ऐसा व्यक्ति दुर्भाग्यवश अपने आपको अपनी सम्पत्ति और धन से जोड़ लेता और उसे अपनी पहचान बना होता है। कभी- कभी संन्यास लेने के बाद भी कोई-कोई किसी मन्दिर में या अपनी कतिपय वस्तुओं में आसक्त हो जाते हैं, जिन्हें वह अपनी सम्पत्ति समझाने लगता है किन्तु ऐसी आसक्ति गृहस्थी के प्रति आकर्षण के समान बलवती नहीं होती। परिवार की आसक्ति सबसे प्रबल मोह है। सत्य-संहिता में कहा गया है— ब्रह्माद्या याज्ञवल्काद्या मुच्यन्ते स्त्री-सहायिन:।
बोध्यन्ते केचनैतेषां विशेषं च विदो विदु: ॥

कभी कभी यह देखा जाता है कि ब्रह्मा जैसे महापुरुषों के लिए स्त्री तथा पुत्र बन्धन के कारण नहीं बनते। उल्टे, पत्नी आध्यात्मिक जीवन तथा मुक्ति में सहायक बनती है। तो भी अधिकांश व्यक्ति दाम्पत्य भाव की ग्रन्थि से बँधे रहते हैं, फलत: वे कृष्ण के साथ अपने सम्बन्ध को भूल जाते हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥