श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 6: भगवान् ऋषभदेव के कार्यकलाप  »  श्लोक 6

 
श्लोक
अथैवमखिललोकपालललामोऽपि विलक्षणैर्जडवदवधूतवेषभाषाचरितैरविलक्षितभगवत्प्रभावो योगिनां साम्परायविधिमनुशिक्षयन् स्वकलेवरं जिहासुरात्मन्यात्मानमसंव्यवहितमनर्थान्तरभावेनान्वीक्षमाण उपरतानुवृत्तिरुपरराम ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
अथ—तत्पश्चात्; एवम्—इस प्रकार से; अखिल-लोक-पाल-ललाम:—इस ब्रह्माण्ड के समस्त राजाओं के प्रमुख; अपि— यद्यपि; विलक्षणै:—विभिन्न; जड-वत्—जड़-सदृश (मूढ़ के समान); अवधूत-वेष-भाषा-चरितै:—अवधूत के वेष, उसकी भाषा तथा आचरण से; अविलक्षित-भगवत्-प्रभाव:—भगवान् के ऐश्वर्य को छिपाते हुए (अपने को सामान्य पुरुष की तरह रखते हुए); योगिनाम्—योगियों का; साम्पराय-विधिम्—इस देह के त्याग की विधि; अनुशिक्षयन्—सिखाते हुए; स्व- कलेवरम्—अपने शरीर को जो किंचित्मात्र भौतिक नहीं था; जिहासु:—सामान्य मनुष्य की भाँति त्यागने की इच्छा से; आत्मनि—आदिपुरुष वासुदेव में; आत्मानम्—अपने आप, भगवान् विष्णु के “आवेश-अवतार” होने से ऋषभदेव स्वयं को; असंव्यवहितम्—माया के व्यवधान के बिना; अनर्थ-अन्तर-भावेन—विष्णुपद में स्वयं; अन्वीक्षमाण:—सदैव देखते हुए; उपरत-अनुवृत्ति:—ऐसा दिखा रहे थे मानो अपना भौतिक शरीर त्याग रहे हों; उपरराम—राजा के रूप में इस लोक की लीलाएँ छोड़ दीं ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् ऋषभदेव इस ब्रह्माण्ड के समस्त राजाओं में प्रमुख थे, किन्तु अवधूत का भेष तथा उसकी भाषा स्वीकार करके वे इस प्रकार आचरण कर रहे थे मानो जड़ तथा बद्ध जीव हों। फलत: कोई उनके ईश्वरीय ऐश्वर्य को नहीं देख सका। उन्होंने योगियों को देह त्यागने की विधि सिखाने के लिए ही ऐसा आचरण किया; तो भी वे वासुदेव कृष्ण के अंश रूप बने रहे। इस दशा में रहते हुए उन्होंने इस संसार में भगवान् ऋषभदेव के रूप में की गई लीलाओं को त्याग दिया। यदि कोई ऋषभदेव के पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए इस सूक्ष्म देह को त्याग सकता है, तो उसे पुन: भौतिक देह नहीं धारण करनी पड़ती।
 
तात्पर्य
 जैसाकि भगवद्गीता (४.९) में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वत:।

त्यक्त्या देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥

“हे अर्जुन! मेरा आविर्भाव और कर्म दिव्य हैं—इस प्रकार जो मनुष्य जान लेता है, वह देह को त्याग कर संसार में फिर जन्म नहीं लेता, वरन् मेरे सनातन धाम को प्राप्त होता है।” यह तभी सम्भव है जब कोई परमेश्वर का शाश्वत दास बन जाये। मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी तथा साथ ही साथ परमेश्वर दोनों की स्वाभाविक स्थिति को समझे। दोनों का एक ही आध्यात्मिक-रूप है। इस संसार में परमेश्वर का शाश्वत दास बन कर ही पुनर्जन्म से बचा सकता है। यदि मनुष्य अपने को आध्यात्मिक रूप से ठीक रखे और अपने को परमेश्वर का शाश्वत दास मानता रहे तो इस भौतिक शरीर का त्याग करते समय उसे सफलता मिलेगी।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥