श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 7: राजा भरत कार्यकलाप  »  श्लोक 12

 
श्लोक
तयेत्थमविरतपुरुषपरिचर्यया भगवति प्रवर्धमानानुरागभरद्रुतहृदयशैथिल्य: प्रहर्षवेगेनात्मन्युद्भ‍िद्यमानरोमपुलककुलक औत्कण्ठ्यप्रवृत्तप्रणयबाष्पनिरुद्धावलोकनयन एवं निजरमणारुणचरणारविन्दानुध्यानपरिचितभक्तियोगेन परिप्लुतपरमाह्लादगम्भीरहृदयह्रदावगाढधिषणस्तामपि क्रियमाणां भगवत्सपर्यां न सस्मार ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
तया—उसके द्वारा; इत्थम्—इस प्रकार; अविरत—निरन्तर; पुरुष—परमेश्वर की; परिचर्यया—सेवा द्वारा; भगवति—श्रीभगवान् में; प्रवर्धमान—निरन्तर बढ़ती हुई; अनुराग—आसक्ति का; भर—भार से; द्रुत—द्रवित; हृदय—हृदय; शैथिल्य:—शिथिलता; प्रहर्ष-वेगेन—दिव्य हर्ष के वेग से; आत्मनि—अपने शरीर में; उद्भिद्यमान-रोम-पुलक-कुलक:—रोमांच, रोमों का खड़ा होना; औत्कण्ठ्य—उत्कंठा के कारण; प्रवृत्त—उत्पन्न; प्रणय-बाष्प-निरुद्ध-अवलोक-नयन:—प्रेमाश्रु प्रकट होने से दृष्टि में अवरोध; एवम्—इस प्रकार; निज-रमण-अरुण-चरण-अरविन्द—ईश्वर के लाल लाल चरणकमलों पर; अनुध्यान—ध्यान करने से; परिचित—बढ़ा हुआ; भक्ति-योगेन—भक्ति के कारण; परिप्लुत—सर्वत्र फैलकर; परम—सर्वोच्च; आह्लाद—आनन्द का; गम्भीर—अत्यन्त गहरा; हृदय-ह्रद—हृदय रूपी सरोवर; अवगाढ—डूबा हुआ; धिषण:—जिसकी बुद्धि; ताम्—वह; अपि— यद्यपि; क्रियमाणाम्—करते हुए; भगवत्—श्रीभगवान् का; सपर्याम्—आराधना; न—नहीं; सस्मार—स्मरण रहा ।.
 
अनुवाद
 
 इस प्रकार सर्वश्रेष्ठ भक्त महाराज भरत ईश्वर की भक्ति में निरन्तर लगे रहे। स्वाभाविक रूप से वासुदेव श्रीकृष्ण के प्रति उनका प्रेम बढ़ता गया और अन्तत: उनका हृदय द्रवित हो उठा। फलत: धीरे-धीरे समस्त विधि-विधानों के प्रति उनकी आसक्ति जाती रही। उन्हें रोमांच होने लगा और आह्लाद के सभी शारीरिक लक्षण (भाव) प्रकट होने लगे। उनके नेत्रों से अश्रुओं की अविरल धारा बहने लगी जिससे वे कुछ भी देखने में असमर्थ हो गये। इस प्रकार वे निरन्तर ईश्वर के अरुण चरणारविन्द पर ध्यान लगाये रहते। उस समय उनका सरोवर के सदृश हृदय आनन्द- जल से पूरित हो गया। जब उनका मन इस सरोवर में निमग्न हो गया तो वे नियमपूर्वक सम्पन्न की जाने वाली भगवद् पूजा भी भूल गये।
 
तात्पर्य
 जब कोई श्रीकृष्ण के प्रेम में विभोर हो उठता है, तो शरीर में आठ दिव्य आनन्दमय लक्षण (भाव) प्रकट होते हैं। ये सिद्धि के लक्षण हैं, जो पूर्ण पुरुषोत्तम
भगवान् की प्रेमाभक्ति से उठते हैं। चूँकि महाराज भरत निरन्तर भक्ति में लीन रहते थे इसलिए ये हर्षातिरेक के लक्षण उनमें प्रकट हुए।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥