श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 7: राजा भरत कार्यकलाप  »  श्लोक 5

 
श्लोक
ईजे च भगवन्तं यज्ञक्रतुरूपं क्रतुभिरुच्चावचै: श्रद्धयाऽऽहृताग्निहोत्रदर्शपूर्णमासचातुर्मास्यपशुसोमानां प्रकृतिविकृतिभिरनुसवनं चातुर्होत्रविधिना ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
ईजे—आराधना की; च—भी; भगवन्तम्—भगवान् की; यज्ञ-क्रतु-रूपम्—पशु सहित तथा पशु रहित यज्ञों वाले; क्रतुभि:— ऐसे यज्ञों से; उच्चावचै:—अत्यन्त बड़े तथा अत्यन्त छोटे; श्रद्धया—श्रद्धा समेत; आहृत—किया गया; अग्नि-होत्र—अग्नि होत्र यज्ञ का; दर्श—दर्श यज्ञ का; पूर्णमास—पूर्णमास यज्ञ का; चातुर्मास्य—चातुर्मास्य यज्ञ का; पशु-सोमानाम्—पशु तथा सोम रस से सम्पन्न यज्ञों का; प्रकृति—पूर्ण अनुष्ठानों द्वारा; विकृतिभि:—तथा आंशिक अनुष्ठानों द्वारा; अनुसवनम्—प्राय:; चातु: होत्र-विधिना—चार प्रकार के पुरोहितों (ऋत्विजों) द्वारा निर्देशित यज्ञ विधि-विधानों के द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 राजा भरत ने अत्यन्त श्रद्धापूर्वक अनेक प्रकार के यज्ञ किये। इनके नाम हैं अग्निहोत्र, दर्श, पूर्णमास, चातुर्मास्य, पशु-यज्ञ (जिसमें अश्व की बलि दी जाती थी) तथा सोम-यज्ञ (जिसमें सोमरस प्रयुक्त होता था) भेंट किया जाता था । कभी ये यज्ञ पूर्ण रूप से तो कभी आंशिक रूप में सम्पन्न किये जाते थे। प्रत्येक दशा में समस्त यज्ञों में चातुर्होत्र नियमों का दृढ़ता से पालन किया जाता था। इस प्रकार भरत महाराज भगवान् की उपासना करते थे।
 
तात्पर्य
 यज्ञ की पूर्ण सम्पन्नता की परीक्षा के लिए ही सूकरों तथा गायों की बलि दी जाती थी; अन्यथा पशुओं की बलि चढ़ाने का कोई प्रयोजन न था। वास्तव में यज्ञ-अग्नि में पशु बलि पुन: तरुण-जीवन प्राप्त करने के लिए की जाती थी। सामान्यत: बूढ़े पशु की बलि दी जाती थी जो तरुण शरीर लेकर पुन: प्रकट हो जाता था। किन्तु कुछ अनुष्ठानों में पशु बलि की आवश्यकता नहीं पड़ती थी। वर्तमान युग में पशुओं की बलि पर प्रतिबन्ध है। जैसाकि श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा है (चैतन्य चरितामृत आदि १७.१६४)—
अश्वमेधं गवालम्भं संन्यासं पल-पैतृकम्।

देवरेण सुतोत्पत्तिं कलौ पंच विवर्जयेत् ॥

“इस कलियुग में पाँच प्रकार के कार्य वर्जित हैं—यज्ञ में अश्व की बलि, यज्ञ में गोबलि, संन्यास धारण करना, पितरों को मांस-अर्पण करना तथा भाई की पत्नी से सन्तानोत्पत्ति।” कलियुग में ऐसे यज्ञ असम्भव हैं, क्योंकि ऐसे पटु ब्राह्मणों या ऋत्विजों का अभाव है जो इस उत्तरदायित्व को ग्रहण कर सकें। इन यज्ञों के अभाव में संकीर्तन यज्ञ की संस्तुति की जाती है। यज्ञै: संकीर्तनप्रायै र्यजन्ति हि सुमेधस: (भागवत ११.५.३२)। कुल मिलाकर यज्ञों का उद्देश्य भगवान् को प्रसन्न करना है। यज्ञार्थकर्म—ऐसे कार्य भगवान् की प्रसन्नता के लिए किये जाने चाहिए। इस कलिकाल में भगवान् के अवतार श्री चैतन्य महाप्रभु की उनके पार्षदों सहित उपासना संकीर्तन यज्ञ द्वारा की जानी चाहिए जिसमें “हरे कृष्ण मंत्र” का सामूहिक जप किया जाता है। यह विधि बुद्धिमान व्यक्तियों द्वारा स्वीकार की जाती है। यज्ञै: संकीर्तनप्रायै र्यजन्ति हि सुमेधस:। सुमेधस: शब्द उन बुद्धिमान लोगों के लिए प्रयुक्त है जिनका मस्तिष्क उच्च कोटि का होता है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥