श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 7: राजा भरत कार्यकलाप  »  श्लोक 7

 
श्लोक
एवं कर्मविशुद्ध्या विशुद्धसत्त्वस्यान्तर्हृदयाकाशशरीरे ब्रह्मणि भगवति वासुदेवे महापुरुषरूपोपलक्षणे श्रीवत्सकौस्तुभवनमालारिदरगदादिभिरुपलक्षिते निजपुरुषहृल्लिखितेनात्मनि पुरुषरूपेण विरोचमान उच्चैस्तरां भक्तिरनुदिनमेधमानरयाजायत ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस प्रकार; कर्म-विशुद्ध्या—श्रीभगवान् को प्रत्येक वस्तु अर्पित करते हुए अपने पुण्यकर्मों के फल की अभिलाषा न करते हुए, कर्म शुद्धि से; विशुद्ध-सत्त्वस्य—भरत महाराज का, जिनका जीवन पूर्णत: शुद्ध था; अन्त:-हृदय-आकाश-शरीरे— योगियों द्वारा ध्यान किये जाने वाले अन्तर्यामी परमात्मा; ब्रह्मणि—निराकार ब्रह्म में, जिसकी आराधना निर्गुण ज्ञानी करते हैं; भगवति—श्रीभगवान् में; वासुदेवे—वासुदेव श्रीकृष्ण में; महा-पुरुष—परम पुरुष का; रूप—स्वरूप, आकार; उपलक्षणे— लक्षणों वाला; श्रीवत्स—भगवान् के वक्षस्थल का चिह्न, श्रीवत्स; कौस्तुभ—कौस्तुभ मणि; वन-माला—पुष्पों का हार; अरि दर—चक्र तथा शंख; गदा-आदिभि:—(तथा) गदा इत्यादि अन्य लक्षणों से; उपलक्षिते—पहचाना जाकर; निज-पुरुष-हृत्- लिखितेन—जो अपने भक्तों के हृदय में चित्र की भाँति स्थित हैं; आत्मनि—अपने मन में; पुरुष-रूपेण—अपने स्वरूप से; विरोचमाने—चमकता; उच्चैस्तराम्—अति उच्च स्तर पर; भक्ति:—भक्ति; अनुदिनम्—दिन प्रति दिन; एधमान—बढ़ता हुआ; रया—बलशाली; अजायत—प्रकट हुआ ।.
 
अनुवाद
 
 इस प्रकार यज्ञों से परिष्कृत महाराज भरत का हृदय सर्वथा कल्मषहीन हो गया। दिन प्रति दिन वासुदेव श्रीकृष्ण के प्रति उनकी भक्ति बढ़ती रही। वसुदेव पुत्र श्रीकृष्ण आदि भगवान् हैं, जो परमात्मा रूप में तथा निर्गुण ब्रह्म के रूप में प्रकट होते हैं। योगी लोग अपने हृदय में स्थित परमात्मा का ध्यान धरते हैं, ज्ञानी परम सत्य निर्गुण ब्रह्म के रूप में उपासना करते हैं और भक्त जन शास्त्रों में वर्णित दिव्य देहधारी भगवान् वासुदेव की आराधना करते हैं। उनका शरीर श्रीवत्स, कौस्तुभ मणि तथा पुष्पहार से सुशोभित है और वे हाथों में शंख, चक्र, गदा तथा कमल धारण किये हुए हैं। नारद जैसे भक्त अपने अन्त:करण में उनका सदा ध्यान धरते हैं।
 
तात्पर्य
 भगवान् वासुदेव अर्थात् श्रीकृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। वे योगियों के हृदय में परमात्मा रूप में प्रकट होते हैं और ज्ञानी लोग निर्गुण ब्रह्म के रूप में उनकी उपासना करते हैं। शास्त्रों में परमात्मा के स्वरूप का वर्णन किया गया है, जिसमें वे चतुर्भुज रूप में शंख, चक्र, गदा तथा कमल धारण किये हुए रहते हैं। इसकी पुष्टि श्रीमद्भागवत (२.२.८) में भी हुई है— केचित्स्वदेहान्तर्हृदयावकाशे प्रादेशमात्रं पुरुषं वसन्तम्।
चतुर्भुजं कञ्जरथाङ्गशंखगदाधरं धारणया स्मरन्ति ॥

परमात्मा सभी जीवों के हृदयों में स्थित हैं। उनके चार हाथ होते हैं जिनमें वे आयुध धारण किये रहते हैं। ऐसे सभी भक्त जो परमात्मा का ध्यान धरते हैं मन्दिर के अर्चाविग्रह के रूप से श्रीभगवान् की पूजा करते हैं। वे ईश्वर के निर्गुण स्वरूप तथा उनके ब्रह्मतेज से भी परिचित होते हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥