श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 7: राजा भरत कार्यकलाप  »  श्लोक 8

 
श्लोक
एवं वर्षायुतसहस्रपर्यन्तावसितकर्मनिर्वाणावसरोऽधिभुज्यमानं स्वतनयेभ्यो रिक्थं पितृपैतामहं यथादायं विभज्य स्वयं सकलसम्पन्निकेतात्स्वनिकेतात् पुलहाश्रमं प्रवव्राज ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस प्रकार सदैव कार्यरत रहकर; वर्ष-अयुत-सहस्र—दस हजार वर्षों के एक हजार गुने वर्ष अर्थात् एक करोड़ वर्ष; पर्यन्त—बीतने तक; अवसित-कर्म-निर्वाण-अवसर:—राज्य-ऐश्वर्य का अन्त समझ कर महाराज भरत; अधिभुज्यमानम्—उस काल तक इस प्रकार भोगी जाकर; स्व-तनयेभ्य:—अपने पुत्रों को; रिक्थम्—सम्पत्ति; पितृ-पैतामहम्—अपने पिता तथा पूर्वजों से प्राप्त; यथा-दायम्—मनु के दाय-भाक् नियम के अनुसार (यथायोग्य); विभज्य—बाँट कर; स्वयम्—स्वयं, आप; सकल-सम्पत्—सभी प्रकार के ऐश्वर्यों का; निकेतात्—घर से; स्व-निकेतात्—अपने पैतृक घर से; पुलह-आश्रमम् प्रवव्राज— हरद्वार में पुलह आश्रम चला गया (जहाँ शालग्राम शिलाएँ प्राप्त होती हैं) ।.
 
अनुवाद
 
 प्रारब्ध ने महाराज भरत के लिए भौतिक ऐश्वर्य-भोग की अवधि एक करोड़ वर्ष नियत कर दी थी। जब यह अवधि समाप्त हुई तो उन्होंने गृहस्थ जीवन त्याग दिया और अपने पूर्वजों से प्राप्त सम्पत्ति को अपने पुत्रों में बाँट दिया, उन्होंने समस्त ऐश्वर्य के आगार अपने पैतृकगृह को छोड़ दिया और वे पुलहाश्रम के लिए चल पड़े जो हरद्वार में स्थित है। वहाँ शालग्राम शिलाएँ प्राप्त होती हैं।
 
तात्पर्य
 दाय-भाक् नियम के अनुसार जब किसी को कोई सम्पति मिल जाती है, तो उसे अगली पीढ़ी को हस्तान्तरित करना होता है। महाराज भरत ने इसे सुचारु रूप से सम्पन्न किया। पहले तो
पैतृक सम्पत्ति का उन्होंने स्वयं एक करोड़ वर्षों तक उपभोग किया और विरक्त होते समय इस सम्पत्ति को अपने पुत्रों में बाँट दिया और वे स्वयं पुलह-आश्रम चले गये।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥