श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 8: भरत महाराज के चरित्र का वर्णन  »  श्लोक 12

 
श्लोक
कुशकुसुमसमित्पलाशफलमूलोदकान्याहरिष्यमाणो वृकसालावृकादिभ्यो भयमाशंसमानो यदा सह हरिणकुणकेन वनं समाविशति ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
कुश—अनुष्ठानों में प्रयुक्त एक प्रकार की घास, कुश; कुसुम—फूल; समित्—समिधा, जलाने की लकड़ी; पलाश—पत्ते; फल-मूल—फल तथा कन्द; उदकानि—(तथा) जल; आहरिष्यमाण:—एकत्र करने की इच्छा होने पर; वृकसाला-वृक— भेडिय़ों तथा कुत्तों से; आदिभ्य:—तथा अन्य पशु यथा बाघ आदि से; भयम्—भय, डर; आशंसमान:—आशंकित; यदा— जब; सह—साथ; हरिण-कुणकेन—मृग-छौना के; वनम्—जंगल में; समाविशति—प्रवेश करता है ।.
 
अनुवाद
 
 जब महाराज भरत को कुश, फूल, लकड़ी, पत्ते, फल, कन्द तथा जल लाने के लिए जंगल में जाना होता तो उन्हें भय बना रहता कि कुत्ते, सियार, बाघ तथा अन्य हिंस्र पशु आकर मृग को मार न डालें। अत: वे जंगल में जाते समय उसे अपने साथ-ले जाते।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर यह बताया गया है कि महाराज भरत ने मृग के प्रति अपने स्नेह को किस प्रकार बढ़ा लिया था। भरत महाराज जैसे महान् पुरुष को, जिन्हें भगवान् का स्नेह प्राप्त था, एक पशु से स्नेह के कारण अपने पद से नीचे आना पड़ा। फलत: जैसाकि हम आगे देखेंगे, उन्हें अगले जन्म में मृग का शरीर अपनाना पड़ा। जब महाराज भरत का यह हाल हुआ तो भला जो आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़े हुए नहीं हैं,
किन्तु बिल्लियों तथा कुत्तों में आसक्त हैं उनका क्या होगा? जब ऐसे लोग भगवान् के प्रति अपने स्नेह तथा प्यार को बढ़ाते नहीं, तब तक कुत्तों तथा बिल्लियों के प्रति स्नेह के कारण उन्हें अगले जन्म में वैसे ही शरीर धारण करने पड़ेंगे। जब तक हम परमेश्वर के प्रति अपनी श्रद्धा नहीं बढ़ाते, तब तक हम अनेक वस्तुओं के प्रति आकर्षित होते रहेंगे भौतिक बन्धन का यही कारण है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥