श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 8: भरत महाराज के चरित्र का वर्णन  »  श्लोक 15

 
श्लोक
अन्यदा भृशमुद्विग्नमना नष्टद्रविण इव कृपण: सकरुणमतितर्षेण हरिणकुणक विरहविह्वलहृदयसन्तापस्तमेवानुशोचन् किल कश्मलं महदभिरम्भित इति होवाच ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
अन्यदा—कभी कभी (मृग छौने को न देखकर); भृशम्—अत्यधिक; उद्विग्न-मना:—चिन्ताओं से युक्त मन; नष्ट-द्रविण:— जिसका धन लुट गया हो; इव—सदृश; कृपण:—कंजूस व्यक्ति; स-करुणम्—करुणापूर्वक; अति-तर्षेण—अत्यन्त चिन्ता से; हरिण-कुणक—मृग छौने के; विरह—वियोग से; विह्वल—व्याकुल; हृदय—मन या हृदय में; सन्ताप:—शोक; तम्—उन छौने को; एव—केवल; अनुशोचन्—निरन्तर ध्यान करते; किल—निश्चय ही; कश्मलम्—मोह; महत्—अत्यधिक; अभिरम्भित:— प्राप्त किया; इति—इस प्रकार; ह—निश्चय ही; उवाच—कहा ।.
 
अनुवाद
 
 कभी कभी भरत महाराज यदि उस मृग को न देखते तो उनका मन अत्यन्त व्याकुल हो उठता। उनकी स्थिति उस कंजूस व्यक्ति के समान हो जाती जिसे कुछ धन प्राप्त हुआ हो, किन्तु उसके खो जाने से वह अत्यन्त दुखी हो गया हो। जब मृग चला जाता, तो उन्हें चिन्ता हो जाती और वियोग के कारण वे विलाप करने लगते। इस प्रकार मोहग्रस्त होने पर वे निम्नलिखित प्रकार से कहते।
 
तात्पर्य
 यदि किसी निर्धन व्यक्ति का कुछ धन या सोना खो जाता है, तो वह अत्यन्त उद्विग्न हो जाता है। इसी प्रकार महाराज भरत का मन मृग को न देखने पर उद्विग्न हो उठता। यह उदाहरण बताता है कि किस प्रकार हमारी आसक्ति बदल सकती है। यदि हमारी आसक्ति ईश्वर की सेवा में लग जाये तो हम प्रगति करते हैं। श्रील रूप गोस्वामी ने ईश्वर से प्रार्थना की कि मैं भगवान्
की सेवा के प्रति उसी प्रकार आकृष्ट होऊँ जिस प्रकार तरुण तथा तरुणियाँ परस्पर आकृष्ट होते हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु ने समुद्र में कूदकर या रात्रि भर वियोगवश रो-रो करईश्वर के प्रति ऐसी आसक्ति प्रदर्शित की। किन्तु यदि हमारी आसक्ति ईश्वर से मुडक़र भौतिक पदार्थों के प्रति हो जाये तो हम आध्यात्मिक पद से नीचे गिर जाएँगे।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥