श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 8: भरत महाराज के चरित्र का वर्णन  »  श्लोक 17

 
श्लोक
अपि क्षेमेणास्मिन्नाश्रमोपवने शष्पाणि चरन्तं देवगुप्तं द्रक्ष्यामि ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
अपि—हो सकता है कि; क्षेमेण—हिंस्र पशुओं के अभाव के कारण निर्भय होने से; अस्मिन्—इस; आश्रम-उपवने—आश्रम के उद्यान में; शष्पाणि चरन्तम्—मुलायम घास चरते हुए; देव-गुप्तम्—देवताओं द्वारा रक्षित; द्रक्ष्यामि—क्या मैं देखूँगा? ।.
 
अनुवाद
 
 ओह! क्या ऐसा हो सकता है कि मैं इस पशु को देवताओं से रक्षित तथा हिंस्र पशुओं से निर्भय रूप में फिर देखूँ? क्या मैं उसे पुन: उद्यान में मुलायम घास चरते हुए देख सकूँगा?
 
तात्पर्य
 महाराज भरत ने सोचा कि मृग उनकेसंरक्षण से निराश होकर उन्हें छोडक़र किसी देवता की शरण में चला गया है। फिर भी वे उस पशु को मुलायम घास चरते हुए तथा हिंस्र पशुओं से निर्भय होकर अपने आश्रम में देखने के अत्यधिक इच्छुक थे। उन्हें केवल मृग का ध्यान रहता था तथा सभी प्रकार के पशुओं से उसकी
रक्षा करने की चिन्ता रहती थी। भौतिक दृष्टि से ऐसे विचार अत्यन्त प्रशंसनीय कहे जायँगे, किन्तु आध्यात्मिक दृष्टि से राजा अपने आध्यात्मिक पद से नीचे गिर रहे थे और वृथा ही एक पशु पर इतने आसक्त होते जा रहे थे। अपने को इस प्रकार पतित बना देने पर उन्हें पशु शरीर ग्रहण करना पड़ा।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥