श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 8: भरत महाराज के चरित्र का वर्णन  »  श्लोक 20

 
श्लोक
अपिस्विदकृतसुकृतमागत्य मां सुखयिष्यति हरिणराजकुमारो विविधरुचिरदर्शनीयनिजमृगदारकविनोदैरसन्तोषं स्वानामपनुदन् ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
अपि स्वित्—क्या वह करेगा; अकृत-सुकृतम्—जिसने कभी कोई पुण्य कार्य नहीं किया; आगत्य—वापस आकर; माम्— मुझको; सुखयिष्यति—आनन्दित करेगा; हरिण-राज-कुमार:—हिरण, जिसका पालन राजकुमार के समान हुआ; विविध— अनेक; रुचिर—मनोहर; दर्शनीय—देखने योग्य; निज—अपना; मृग-दारक—मृगशावक के उपयुक्त; विनोदै:—क्रीड़ाओं से; असन्तोषम्—असन्तोष; स्वानाम्—स्वजनों का; अपनुदन्—दूर करते हुए ।.
 
अनुवाद
 
 वह मृग राजकुमार के तुल्य है। वह कब लौटेगा? वह कब फिर अपनी मनोहर क्रीड़ाएँ दिखायेगा? वह कब मेरे आहत-हृदय को पुन: शान्त करेगा? अवश्य ही मेरे पुण्य शेष नहीं हैं, अन्यथा अब तक वह मृग अवश्य लौट आया होता।
 
तात्पर्य
 अपने प्रबल स्नेह के कारण राजा छोटे से हिरण को राजकुमार मान बैठा। यह मोह कहलाता है। मृग की अनुपस्थिति के कारण चिन्तावश राजा
ने पशु को इस प्रकार सम्बोधित किया मानो वह उसका पुत्र हो। स्नेह के वशीभूत होने पर किसी को कुछ भी कह कर पुकारा जा सकता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥