श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 8: भरत महाराज के चरित्र का वर्णन  »  श्लोक 21

 
श्लोक
क्ष्वेलिकायां मां मृषासमाधिनाऽऽमीलितदृशं प्रेमसंरम्भेण चकितचकित आगत्य पृषदपरुषविषाणाग्रेण लुठति ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
क्ष्वेलिकायाम्—खेल में; माम्—मुझको; मृषा—झूठ मूठ; समाधिना—समाधि से; आमीलित-दृशम्—बन्द आँखों से; प्रेम- संरम्भेण—प्रेम के कारण उत्पन्न क्रोध से; चकित-चकित:—डर से; आगत्य—आकर; पृषत्—जल बिन्दुओं के समान; अपरुष—अत्यन्त नम्र; विषाण—सींगों के; अग्रेण—अग्रभाग से, नोक से; लुठति—मेरा शरीर छूता है ।.
 
अनुवाद
 
 ओह! जब यह छोटा-सा हिरण, मेरे साथ खेलते हुए और मुझे आँखें बन्द करके झूठ-मूठ ध्यान करते देख कर, प्रेम से उत्पन्न क्रोध के कारण मेरे चारों ओर चक्कर लगाता और डरते हुए अपने मुलायम सींगों की नोकों से मुझे छूता, जो मुझे जल बिन्दुओं के समान प्रतीत होते।
 
तात्पर्य
 अब महाराज भरत को अपना ध्यान झूठा लगा। ध्यान करते समय वे वास्तव में मृग के विषय में सोचते रहते और जब वह आकर अपने पैने सींगों से कुरेदता तो
उन्हें अत्यधिक प्रसन्नता होती। ध्यान का बहाना करते हुए राजा वास्तव में इसी मृग के विषय में सोचते रहते और यही उनके पतन का संकेत था।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥