श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 8: भरत महाराज के चरित्र का वर्णन  »  श्लोक 25

 
श्लोक
किं वाऽऽत्मजविश्लेषज्वरदवदहनशिखाभिरुपतप्यमानहृदयस्थलनलिनीकं मामुपसृतमृगीतनयं शिशिरशान्तानुरागगुणितनिजवदनसलिलामृतमयगभस्तिभि: स्वधयतीति च ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
किम् वा—अथवा ऐसा हो कि; आत्म-ज—पुत्र से; विश्लेष—वियोग के कारण; ज्वर—ताप; दव-दहन—दावाग्नि की; शिखाभि:—लपटों से; उपतप्यमान—ज्वलित; हृदय—हृदय; स्थल-नलिनीकम्—लाल कमल पुष्प के सदृश; माम्—मुझको; उपसृत-मृगी-तनयम्—जिससे मृगछौना अत्यन्त हिला-मिला हुआ था; शिशिर-शान्त—अत्यन्त शीतल एवं शान्त; अनुराग— प्रेमवश; गुणित—प्रवहमान; निज-वदन-सलिल—अपने मुख का जल; अमृत-मय—अमृत के सदृश उत्तम; गभस्तिभि:— चन्द्रमा की किरणों से; स्वधयति—मुझे आनन्द दे रहा है; इति—इस प्रकार; च—तथा ।.
 
अनुवाद
 
 चाँदनी को देखकर महाराज भरत उन्मत्त पुरुष की भाँति बोलते रहे। उन्होंने कहा—यह मृगछौना इतना विनम्र घुलमिल गया था और मुझे इतना प्रिय था कि इसके वियोग से मुझे अपने पुत्र जैसा वियोग हो रहा है। इसके वियोग-ताप से मुझे दावाग्नि से जल जाने जैसा कष्ट हो रहा है। मेरा हृदय-स्थल कुमुदिनी जैसा जल रहा है। मुझे इतना दुखी देखकर चन्द्रमा मेरे ऊपर चमकते हुए अमृत जैसी वर्षा कर रहा है मानो प्रखर ज्वर से पीडि़त व्यक्ति पर उसका मित्र जल छिडक़ रहा हो। इस प्रकार यह चन्द्रमा मुझे सुख देने वाला है।
 
तात्पर्य
 आयुर्वेदिक चिकित्सा के अनुसार जिस व्यक्ति को तेज ज्वर हो उस पर मुख के कुल्ले से जल का छिडक़ाव करना चाहिए। इससे ज्वर घट जाता है। भरत महाराज अपने पुत्रवत् मृग के वियोग
से अत्यन्त दुखी थे, अत: वे सोच रहे थे कि यह चन्द्रमा अपने मुख में जल भर कर उन पर कुल्ले से छिडक़ रहा है, जिससे उनका तेज ज्वर शमित हो जाये जो उस मृगछौने के विरह के कारण था।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥