श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 8: भरत महाराज के चरित्र का वर्णन  »  श्लोक 26

 
श्लोक
एवमघटमानमनोरथाकुलहृदयो मृगदारकाभासेन स्वारब्धकर्मणा योगारम्भणतो विभ्रंशित: स योगतापसो भगवदाराधनलक्षणाच्च कथमितरथा जात्यन्तर एणकुणक आसङ्ग: साक्षान्नि:श्रेयसप्रतिपक्षतया प्राक्परित्यक्तदुस्त्यजहृदयाभिजातस्य तस्यैवमन्तरायविहत योगारम्भणस्य राजर्षेर्भरतस्य तावन्मृगार्भकपोषणपालनप्रीणनलालनानुषङ्गेणाविगणयत आत्मानमहिरिवाखुबिलं दुरतिक्रम: काल: करालरभस आपद्यत ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस प्रकार; अघटमान—दुर्लभ; मन:-रथ—इच्छाओं से जो मन के रथ के तुल्य हैं; आकुल—दुखी; हृदय:—जिसका हृदय; मृग-दारक-आभासेन—मृग छौने के समान; स्व-आरब्ध-कर्मणा—अपने प्रारब्ध के बुरे कर्म-फलों से; योग- आरम्भणत:—योगानुष्ठान से; विभ्रंशित:—च्युत; स:—वह (महाराज भरत); योग-तापस:—योग तथा तपस्या करता हुआ; भगवत्-आराधन-लक्षणात्—श्रीभगवान् की भक्ति सम्बन्धी क्रियाओं से; च—तथा; कथम्—किस प्रकार; इतरथा—अन्य; जाति-अन्तरे—अन्य जातियोनि वाले; एण-कुणके—मृग छौने के शरीर के प्रति; आसङ्ग:—अत्यधिक आसक्ति; साक्षात्— प्रत्यक्ष; नि:श्रेयस—चरम जीवन-लक्ष्य प्राप्त करने के लिए; प्रतिपक्षतया—प्रतिरोध; प्राक्—पहले; परित्यक्त—छोड़ा हुआ; दुस्त्यज—यद्यपि त्याग करने में अत्यन्त कठिन; हृदय-अभिजातस्य—अपने हृदय से उत्पन्न अपने पुत्रों; तस्य—उसका; एवम्— इस प्रकार; अन्तराय—उस प्रतिरोध (विघ्न) से; विहत—रोका जाकर; योग-आरम्भणस्य—जिसकी योग-साधना का पथ; राज-ऋषे:—राजर्षि; भरतस्य—महाराज भरत का; तावत्—तब तक; मृग-अर्भक—मृगछौना; पोषण—भरण में (दूध पिलाने में); पालन—सुरक्षा में; प्रीणन—प्रसन्न रखने में; लालन—दुलारने में; अनुषङ्गेण—निरन्तर ध्यान करते रहने से; अविगणयत:—उपेक्षा करते हुए; आत्मानम्—अपनी आत्मा की; अहि: इव—सर्प के तुल्य; आखु-बिलम्—चूहे का बिल; दुरतिक्रम:—दुर्लंघ्य; काल:—मृत्यु; कराल—भयानक; रभस:—गतिमान; आपद्यत—आ गया ।.
 
अनुवाद
 
 शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा, हे राजन्, इस प्रकार महाराज भरत दुर्दमनीय आकांक्षा से अभिभूत हो गये जो मृग के रूप में प्रकट हुई। अपने पूर्वकर्मों के फल के कारण वे योग, तप तथा भगवान् की आराधना से च्युत हो गये। यदि यह पूर्वकर्मों के कारण नहीं हुआ तो वे क्योंकर अपने पुत्र तथा परिवार को अपने आध्यात्मिक जीवन के पथ पर अवरोध समझ कर त्याग देने के बाद भी मृग से इतना आकृष्ट होते? वे मृग के लिए इतना दुर्दम्य स्नेह क्यों प्रकट करते? यह निश्चय ही उनके पूर्वकर्म का फल था। राजा मृग को सहलाने तथा उसके लालन पालन में इतने व्यस्त रहते कि वे अपने आध्यात्मिक वृत्तियों से नीचे गिर गये। कालान्तर में, दुर्लंघ्य मृत्यु उनके समक्ष उपस्थित हो गई जिस प्रकार कोई विषधर सर्प चूहे के द्वारा निर्मित छिद्र में चुपके से घुस जाता है।
 
तात्पर्य
 अगले श्लोकों में देखने में आएगा कि मृत्यु के समय महाराज भरत को मृग से आकर्षण के कारण बाध्य होकर मृग का शरीर धारण करना पड़ा। इस सम्बन्ध में एक प्रश्न पूछा जा सकता है कि भक्त के पूर्व-दुष्कर्मों तथा पापों का उस पर किस प्रकार प्रभाव पड़ सकता है? ब्रह्म-संहिता (५.५४) में कहा गया है—कर्माणि निर्दहति किन्तु च भक्तिभाजाम्—“जो भक्ति-भजन में लगे रहते हैं उनके पूर्वकर्मों के फल की क्षतिपूर्ति हो जाती है।” इसके अनुसार भरत महाराज को उनके पूर्वकर्मों के लिए दण्डित नहीं किया जा सकता था। इसका निष्कर्ष यह होगा कि वे जानबूझ कर मृग के प्रति अत्यधिक लिप्त हो गये और उन्होंने अपनी उन्नति की उपेक्षा की। उनकी इस त्रुटि को तुरन्त सुधारने के लिए उन्हें अल्प काल के लिए मृग का शरीर प्रदान किया गया। यह उनकी भक्ति को सुदृढ़ करने के लिए किया गया था। यद्यपि उन्हें पशु शरीर दिया गया, किन्तु वे यह नहीं
भूल पाये कि जानबूझ कर की गई उनकी त्रुटि के कारण ही ऐसा हुआ। वे इस मृग शरीर से उद्धार पाने के लिए अत्यन्त उत्सुक थे जिससे सूचित होता है वे भक्ति के प्रति अधिकाधिक स्नेहिल हो उठे थे जिससे अगले जन्म में उन्हें ब्राह्मण का शरीर प्राप्त हो सका जिससे वे अपने लक्ष्य में सिद्धि पा सके। इसी दृढ़ विश्वास के साथ ही हम अपनी पत्रिका बैक टु गाडहेड में यह घोषित करते हैं कि वृन्दावन में रहने वाले कुछ गोस्वामी भक्त, जो जानबूझ कर पाप करते हैं, वे उस पवित्र भूमि में कुत्ते, बन्दर तथा कछुवे का शरीर धारण करते हैं। इस प्रकार वे कुछ काल तक निम्न योनि में रहते हैं और अपना ऐसा पशु-शरीर त्यागने के बाद वे पुन: वैकुंठलोक जाते हैं। ऐसा अल्पकालिक दंड विगत कर्मों का फल नहीं होता। भले ही यह विगत कर्म के कारण प्रतीत हो, किन्तु यह दण्ड भक्त को अपनी भूल सुधारने और भक्ति में अग्रसर होने के लिए दिया जाता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥